शीतला अष्टमी 2027

मंगलवार, 30 मार्च 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • माताएँ: माताएँ अपने बच्चों को बीमारियों, विशेषकर चेचक और बुखार, से बचाने और परिवार के स्वास्थ्य तथा लंबी आयु के लिए यह दिन मनाती हैं।
  • स्वास्थ्य की कामना करने वाले परिवार: जो परिवार संक्रामक रोगों से मुक्ति (रोग मुक्ति) चाहते हैं और आने वाली गर्मी में घर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, वे इस दिन शीतला माता की पूजा करते हैं।

पूजा का समय

  • एक दिन पहले (भोजन बनाना): इस दिन का सारा भोजन पिछली शाम को बना लिया जाता है, और इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।
  • प्रातःकालीन पूजा: शीतला माता की पूजा सुबह जल्दी, स्नान के बाद, सूर्योदय के बाद के घंटों में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • प्रसाद ग्रहण: ठंडा, बासी भोजन (बसौड़ा) पहले देवी को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार दिन में उसे खाता है।

पर्व के बारे में

शीतला अष्टमी, जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है, पूरे उत्तर भारत में मनाया जाने वाला अत्यंत पूजनीय पर्व है, जिसमें परिवार शीतला माता की पूजा करते हैं और एक दिन पहले बना भोजन खाते हैं। यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (शीतला माता की कथा)

बहुत समय पहले शीतल और रोग हरने वाली माता शीतला यह देखने के लिए एक गाँव में उतरीं कि उनके भक्त उनकी पूजा करते हैं या नहीं। उन्होंने एक दुर्बल बुढ़िया का रूप धारण किया, जिसका शरीर चेचक और ताप से भरा था, और वे घर-घर घूमीं।

एक घर में एक स्त्री ने उस अतिथि का कुछ भी ख़याल न करके उन पर गरम माँड उँडेल दिया। बुढ़िया का शरीर जलने से झुलस गया और वे पीड़ा से चीख उठीं। थोड़ी ही देर में पूरा गाँव बुखार की आग में जलने लगा, और केवल एक कुम्हारिन का घर बचा रहा।

कुम्हारिन ने बुढ़िया को ठंडा दही और एक दिन पहले की बनी रबड़ी खिलाई थी, और उनके जले हुए अंगों पर ठंडा दही लगाया था। देवी ने अपना असली रूप प्रकट करके उसे आशीर्वाद दिया और कहा: "इस दिन चूल्हा मत जलाओ। एक दिन पहले का बना ठंडा भोजन खाओ और श्रद्धा से मेरी पूजा करो। मैं तुम्हारे बच्चों को बुखार और रोगों से बचाऊँगी।"

गाँव वालों को पश्चाताप हुआ और उन्होंने सच्ची भक्ति से देवी से प्रार्थना की। उनसे प्रसन्न होकर शीतला माता ने गाँव को रोगमुक्त कर दिया और उनके कष्ट दूर किए। तभी से परिवार शीतला अष्टमी मनाते हैं और माता की रक्षा पाने के लिए ठंडा, बासी भोजन खाते हैं।


पूजा सामग्री

सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / मूर्ति: शीतला माता का चित्र या मूर्ति
  • तिलक और पूजन सामग्री: रोली, हल्दी, कुमकुम और अक्षत
  • दीपक और ज्योति: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती
  • शीतल वस्तुएँ: ठंडे जल का कलश, दही, और अर्पण के लिए जल का एक कटोरा
  • नैवेद्य: पिछले दिन का बना भोजन, जैसे पूरी, पुआ, रबड़ी, हलवा, दही-चावल, और उबले चावल या बाजरा
  • पूजा के अन्य सामान: फूल, कलावा और अर्पण के लिए एक थाली

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, ठंडे जल से स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लें और संकल्प करें: "हे माता शीतला, आज मैं भक्ति के साथ आपकी पूजा कर रही हूँ। मेरे बच्चों और मेरे परिवार को रोगों से बचाएँ और हमें स्वास्थ्य तथा शांति प्रदान करें।"
  3. इस दिन चूल्हा न जलाएँ। केवल पिछले दिन का बना भोजन ही खाएँ।

चरण 2: पूजा वेदी की तैयारी

  1. अपने घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व का कोना) या पूजा स्थान को साफ़ करें।
  2. शीतला माता का चित्र या मूर्ति स्वच्छ वस्त्र से ढकी लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें।
  3. देवी के पास ठंडे जल से भरा कलश रखें और पके हुए भोजन की थाली तैयार रखें।

चरण 3: पूजा करना

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर शीतला माता के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: देवी के चित्र को रोली, हल्दी और अक्षत अर्पित करें।
  3. जल और फूल अर्पित करना: ठंडा जल और ताज़े फूल चढ़ाएँ और कलश पर कलावा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: देवी के सामने बासी भोजन, दही और मिठाइयाँ रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
  2. वेदी के सामने श्रद्धापूर्वक बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति से शीतला माता की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  3. कथा पूरी होने पर दाने देवी के चरणों में अर्पित करें।

चरण 5: आरती और देवी का आशीर्वाद

  1. जलते हुए घी के दीपक से भक्ति-भजन गाते हुए शीतला माता की आरती करें।
  2. कलश के ठंडे जल की कुछ बूँदें परिवार के सदस्यों पर छिड़कें और स्वास्थ्य तथा रक्षा की प्रार्थना करें।
  3. देवी के सामने प्रणाम करें और अपने बच्चों की कुशलता की प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. ठंडा बसौड़ा भोजन प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और बच्चों में बाँटें।
  3. बासी, ठंडा भोजन ही दिन के भोजन के रूप में खाएँ और अगले दिन तक ताज़ा भोजन न पकाएँ।

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