पिठोरी अमावस्या 2027
मंगलवार, 31 अगस्त 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- माताएँ: माताएँ अपनी संतान के स्वास्थ्य, रक्षा और दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं।
- संतान की इच्छुक स्त्रियाँ: संतान की कामना रखने वाली स्त्रियाँ भी चौंसठ योगिनियों का आशीर्वाद पाने के लिए यह व्रत रखती हैं (संतान प्राप्ति)।
पूजा का समय
- प्रातः तैयारी: ब्रह्म मुहूर्त (भोर से पहले का समय) में स्नान करके व्रत का संकल्प लें। अनेक स्त्रियाँ दिन भर उपवास रखती हैं।
- पूजा मुहूर्त: पिठोरी की पूजा शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में होती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- व्रत खोलना: आरती और नैवेद्य के बाद प्रसाद बाँटा जाता है और व्रत खोला जाता है।
पर्व के बारे में
पिठोरी अमावस्या अत्यंत पूजनीय व्रत है, जिसमें माताएँ अपनी संतान की कुशलता के लिए आटे (पीठ) से बनी पिठोरी देवी और चौंसठ योगिनियों की पूजा करती हैं। यह पर्व श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।
व्रत कथा (पिठोरी अमावस्या की कथा)
एक बार की बात है, श्रीधर नाम के एक धनी ब्राह्मण थे। उनके बड़े पुत्र की पत्नी विदेहा को गहरा दुख था: उसकी जो भी संतान होती, जन्म के कुछ ही समय बाद चल बसती। निराश होकर वह एक आश्रम की शरण में गई, जहाँ उसे एक ऐसे व्रत का पता चला जो उसका दुख मिटा सकता था।
परंपरा के अनुसार यह व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने इंद्र की पत्नी इंद्राणी को बताया था, जब इंद्राणी ने पूछा कि संतानहीन स्त्री को संतान का वरदान दिलाने वाला सबसे उत्तम व्रत कौन-सा है। देवी ने समझाया: "इस मास की अमावस्या को आटे से चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ बनाओ, भक्ति से उनकी पूजा करो और पूरी श्रद्धा से उपवास रखो।"
विदेहा ने यह सलाह पूरे मन से मानी। उसने गूँधे हुए आटे से योगिनियों की आकृतियाँ बनाईं, अपनी रसोई में बने भोजन और फूलों से उनकी पूजा की, और दृढ़ विश्वास से व्रत रखा। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर योगिनियों ने उसे आशीर्वाद दिया, और उनकी कृपा से उसे दीर्घायु और स्वस्थ संतानें प्राप्त हुईं। उस दिन से माताएँ अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए पिठोरी अमावस्या का व्रत करती आ रही हैं।
पूजा सामग्री
शाम की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- आटे की आकृतियाँ: पिठोरी देवी और चौंसठ योगिनियाँ बनाने के लिए गेहूँ या चावल के आटे (पीठ) का गूँधा आटा
- तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत
- दीपक और ज्योति: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, और धूप
- पवित्र जल पात्र: स्वच्छ जल से भरा कलश, ऊपर आम के पत्ते
- नैवेद्य: आटे से भाप में पके या बने पकवान, जैसे पूरन पोली या उकडीचे मोदक, साथ में फल और मिठाई
- पूजा की अन्य सामग्री: ताज़े फूल, पान-सुपारी और कलावा
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातः तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो लाल, पीले या हरे; काले वस्त्र न पहनें)।
- दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे माता पिठोरी, आज मैं अपनी संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और कुशलता के लिए यह व्रत रखती हूँ। इस व्रत को शुद्ध भक्ति से पूर्ण करने की शक्ति मुझे दें।"
- दिन भर उपवास रखें और केवल वही ग्रहण करें जो आपके परिवार की परंपरा में मान्य हो।
चरण 2: आकृतियाँ और चौकी तैयार करना (दोपहर बाद)
- पूजा स्थान को स्वच्छ करें और चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएँ।
- आटा गूँधकर पिठोरी देवी और चौंसठ योगिनियों की आकृतियाँ बनाएँ।
- आकृतियों को चौकी पर स्थापित करें और उनके पास जल तथा आम के पत्तों सहित कलश रखें।
चरण 3: सायंकाल की पूजा-विधि
- दीपक जलाना: आकृतियों के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: आकृतियों और कलश पर रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत लगाएँ।
- पुष्प और सूत्र अर्पित करना: ताज़े फूल और पान चढ़ाएँ, और कलश पर कलावा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: आटे से बने पकवान देवी के सामने रखें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- आकृतियों के सामने श्रद्धा से बैठकर गहरे ध्यान और भक्ति के साथ पिठोरी अमावस्या व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा पूरी होने पर हाथ में रखे दाने और पंखुड़ियाँ आकृतियों के चरणों में चढ़ा दें।
चरण 5: आरती
- जलते घी के दीपक से पिठोरी देवी की आरती करें और भक्ति गीत गाएँ।
- हाथ जोड़कर अपनी संतान की दीर्घायु और सुख की प्रार्थना करें।
- देवी को प्रणाम करें और पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा माँगें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
- प्रसाद परिवारजनों और बच्चों में बाँटें।
- प्रसाद ग्रहण करके और सादा सात्त्विक भोजन करके व्रत खोलें।
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