विजयादशमी 2027
9 अक्टूबर 2027 – 10 अक्टूबर 2027
पूजा विधि
यह पर्व कौन मनाता है?
- परिवार और गृहस्थ: हर आयु के भक्त बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाने और सफलता व रक्षा के लिए भगवान राम और माता दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए दशहरा मनाते हैं।
- विद्यार्थी और छोटे बच्चे: बच्चे और विद्यार्थी अपनी पुस्तकों, कलमों और पढ़ाई के साधनों की पूजा करते हैं। केरल में इस दिन माता सरस्वती का आशीर्वाद लेकर पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है (विद्यारंभम्)।
- कामगार, शिल्पकार और योद्धा: औज़ारों, वाहनों या शस्त्रों से काम करने वाले लोग उन्हें साफ़ करके पूजते हैं (शस्त्र पूजा या आयुध पूजा) और अपने काम में समृद्धि व सफलता की प्रार्थना करते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन विधि: केरल का विद्यारंभम् और बंगाल की बिजया की रस्में सुबह, स्नान के बाद और दिन के कामों से पहले शुरू होती हैं। अपने शहर का समय इसी पृष्ठ पर देखें।
- पूजा मुहूर्त: शमी पूजा और शस्त्र पूजा सहित दशहरे की मुख्य पूजा अपराह्न (दोपहर के बाद) में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- रावण दहन: रावण के पुतले का दहन सूर्यास्त के बाद, शाम के शुरुआती समय में होता है (नगर-नगर के रिवाज़ अलग हो सकते हैं)।
पर्व के बारे में
दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं, पूरे भारत में अधर्म पर धर्म की विजय के दिन के रूप में मनाया जाता है। यह नवरात्रि के उत्सवों का समापन भी है। यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है।
कथा (भगवान राम और रावण की कथा)
बहुत समय पहले की बात है। अयोध्या के राजकुमार भगवान राम को अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। वन में रहते समय लंका के बलशाली दस सिरों वाले राजा रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया और उन्हें अपने राज्य में ले गया।
राम शोक से भर गए, पर उन्होंने आशा नहीं छोड़ी। हनुमान, सुग्रीव और वानरों की विशाल सेना की सहायता से वे लंका पहुँचे और रावण को संदेश भेजा कि वह सीता को सम्मान सहित लौटा दे। अपने बल और वरदानों पर घमंड करने वाले रावण ने हर विनती ठुकरा दी। तब भीषण युद्ध छिड़ गया। कहा जाता है कि अंतिम युद्ध से पहले राम ने माता दुर्गा की पूजा की और उनका आशीर्वाद माँगा।
निर्णायक युद्ध से पहले ज्ञानी ऋषि अगस्त्य ने राम को सूर्य देव का स्तोत्र आदित्य हृदयम् सिखाया और शांत मन से उसका ध्यान करने की सलाह दी। राम ने वीरता से युद्ध किया और दसवें दिन रावण का वध करके उसका अहंकार मिटा दिया तथा सीता को सुरक्षित वापस ले आए।
राम की अटल भक्ति और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन पर पुष्प बरसाए और प्रजा ने बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया। तब से हर वर्ष दशहरा मनाया जाता है, जो हम सबको याद दिलाता है कि सत्य और विनम्रता सदा अहंकार और पाप पर विजय पाते हैं।
पूजा सामग्री
दोपहर की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: भगवान राम, माता दुर्गा और माता सरस्वती का चित्र या मूर्ति, या जिन चीज़ों की पूजा करनी हो (पुस्तकें, औज़ार, वाहन)
- तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम, चंदन और अक्षत
- दीप और रोशनी: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, तथा अगरबत्ती
- पवित्र पत्ते: शमी पत्र और जहाँ मिले वहाँ आपटा के पत्ते
- नैवेद्य: लड्डू या खीर जैसी मिठाई, फल और पान
- पूजा की अन्य वस्तुएँ: गेंदे के फूल, मालाएँ, कलावा और स्वच्छ जल का एक छोटा पात्र
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान राम और जगदंबा माता दुर्गा, आज हम शुद्ध भक्ति से यह विजयादशमी की पूजा कर रहे हैं। हमें अपने भीतर के दोषों पर विजय दें और हमारे सभी धर्मसम्मत कार्यों में सफलता प्रदान करें।"
- घर की सफ़ाई करें और द्वार को आम के पत्तों और गेंदे के फूलों से सजाएँ। कई परिवार दिन भर सादा सात्त्विक भोजन करते हैं।
चरण 2: पूजा की चौकी सजाना (दोपहर)
- पूजा का स्थान साफ़ करें और लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ।
- उस पर भगवान राम, माता दुर्गा और माता सरस्वती के चित्र या मूर्तियाँ रखें। अपनी पुस्तकें, औज़ार या वाहन साफ़ करके पास में पूजा के लिए तैयार रखें।
- वेदी के पास स्वच्छ जल से भरा एक छोटा कलश रखें और उसके बगल में शमी के पत्ते रखें।
चरण 3: पूजन-क्रम
- दीपक जलाना: देवताओं के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
- तिलक लगाना: देवताओं को और पूजे जाने वाले सामान को रोली, कुमकुम, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
- फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े गेंदे के फूल और मालाएँ चढ़ाएँ तथा कलश पर कलावा का एक टुकड़ा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: मिठाई, फल और पान देवताओं के सामने रखें।
चरण 4: शमी पूजा और शस्त्र पूजा
- पास में शमी का वृक्ष हो तो उसकी, नहीं तो वेदी पर रखे शमी के पत्तों की रोली, अक्षत और फूलों से पूजा करें। यह शमी पूजा है, जो उस वृक्ष की याद दिलाती है जिस पर पांडवों ने अपने शस्त्र छिपाए थे, ऐसा माना जाता है।
- पुस्तकों, औज़ारों और वाहनों पर तिलक और फूल चढ़ाकर शस्त्र पूजा (आयुध पूजा) करें और उनके उपयोग में सफलता व सुरक्षा की प्रार्थना करें।
- शुभकामना के प्रतीक रूप में बड़ों और मित्रों को शमी या आपटा के पत्ते दें और इन्हें सोना कहें (रिवाज़ क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं)।
- केरल में बच्चों को चावल या रेत पर पहले अक्षर लिखना सिखाया जाता है (विद्यारंभम्), और बंगाल में प्रार्थना के साथ दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन होता है तथा स्त्रियाँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं (सिंदूर खेला)।
चरण 5: आरती और रावण दहन (शाम)
- जलते घी के दीपक से भगवान राम या माता दुर्गा की आरती करें, भजन गाएँ और राम की विजय की रामायण कथा पढ़ें या सुनें।
- शाम के शुरुआती समय में समाज के साथ मिलकर रावण के पुतले का दहन (रावण दहन) देखें, जो अहंकार और बुराई के अंत का प्रतीक है।
- मन ही मन प्रार्थना करें कि आपके भीतर के अहंकार, क्रोध और लोभ जैसे दस दोष भी जलकर नष्ट हो जाएँ।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
- मीठा प्रसाद परिवार, मित्रों और पड़ोसियों में बाँटें और एक-दूसरे को "शुभ विजयादशमी" कहकर बधाई दें (बंगाल में "शुभो बिजया")।
- दिन का समापन परिवार के साथ सात्त्विक भोजन करके करें।
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