आमलकी एकादशी 2027
गुरुवार, 18 मार्च 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- भगवान विष्णु के भक्त: स्त्री-पुरुष जो भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और पिछले पापों से मुक्त होने के लिए एकादशी का व्रत रखते हैं।
- परिवार का कल्याण चाहने वाले: बहुत से घर अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और परिवार में शांति के लिए यह व्रत करते हैं।
- मोक्ष के इच्छुक: आध्यात्मिक पुण्य और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) की आशा रखने वाले श्रद्धालु भी यह व्रत रखते हैं।
पूजा का समय
- संकल्प और व्रत: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय के समय स्नान के बाद संकल्प लिया जाता है और व्रत पूरे दिन रखा जाता है।
- पूजा मुहूर्त: आमलकी एकादशी की पूजा प्रातःकाल पूर्वाह्न में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- रात्रि जागरण: बहुत से परिवार रात भर भजन और कथा के साथ जागरण करते हैं।
- व्रत खोलना (पारण): अगली सुबह द्वादशी तिथि को पारण के समय के भीतर किया जाता है। अपने शहर का पारण समय इसी पृष्ठ पर देखें।
पर्व के बारे में
आमलकी एकादशी एक पवित्र वैष्णव पर्व है, जो पूरे भारत में मनाया जाता है और जिसमें भगवान विष्णु के साथ आंवले के वृक्ष की भी पूजा की जाती है। यह पर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
व्रत कथा (राजा चैत्ररथ की कथा)
प्राचीन काल में वैदिश नाम का एक समृद्ध नगर था, जिस पर धर्मात्मा राजा चैत्ररथ का शासन था। उसकी प्रजा भगवान विष्णु की भक्त थी। फाल्गुन मास की एक एकादशी पर राजा और प्रजा आंवले के वृक्ष के पास एक मंदिर में एकत्र हुए और बड़ी भक्ति से व्रत किया।
उस रात एक भूखा बहेलिया, जिसने हिंसा और पाप का जीवन बिताया था, उस मंदिर में आया। वह भी सबके साथ बैठा, रात भर जागता रहा और भगवान विष्णु की कथाएँ सुनता रहा, यद्यपि वह पूरा व्रत नहीं रख सका। समय आने पर उसकी मृत्यु हो गई।
यह कथा राजा मांधाता को सुनाते हुए महर्षि वसिष्ठ ने कहा: "पवित्र आंवले के वृक्ष के नीचे आमलकी एकादशी पर जागने और कथा सुनने का जो थोड़ा-सा पुण्य उसे मिला, वही उसके पापों को धो देने के लिए पर्याप्त था।" उसी कृपा से वह बहेलिया अगले जन्म में वसुरथ नाम का राजकुमार बना और बड़ा होकर धर्मात्मा और उदार राजा हुआ।
एक बार शिकार करते हुए राजा जंगल में रास्ता भटक गया और एक वृक्ष के नीचे सो गया। उसके शत्रु वनवासियों के एक दल ने उसे देख लिया और उसे मारने के लिए शस्त्र उठाए। तब उस एकादशी के पुण्य से उत्पन्न एक तेजस्वी दिव्य स्त्री राजा के शरीर से प्रकट हुई और उसने उन सबको मार गिराया। जागने पर राजा को आकाशवाणी से पता चला कि भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की है। तभी से श्रद्धालु आमलकी एकादशी का व्रत रखते और आंवले के वृक्ष की पूजा करते आ रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि यह पापों को हरता और सौभाग्य देता है।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: चौकी पर भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति; कुछ श्रद्धालु भगवान परशुराम का चित्र भी रखते हैं
- आंवले का वृक्ष और फल: ताज़े आंवले, या आंवले के वृक्ष के दर्शन
- तिलक और पूजन सामग्री: चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और धूप: घी और रुई की बाती सहित दीपक, तथा धूप या अगरबत्ती
- जल पात्र: ताज़े जल से भरा कलश
- पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, तुलसी दल, कलावा और नैवेद्य के लिए फल
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान विष्णु, आज हम आमलकी एकादशी का व्रत रख रहे हैं। हमारी भूलों को क्षमा करें, हमें और हमारे परिवार को स्वास्थ्य और शांति का आशीर्वाद दें, और शुद्ध भक्ति के साथ यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
- पूरे दिन व्रत रखें और अन्न तथा चावल से दूर रहें (बहुत से श्रद्धालु सामर्थ्य के अनुसार केवल फल, दूध या जल लेते हैं)।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी
- अपने घर या पूजा घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व कोना) साफ़ करें।
- भगवान विष्णु का चित्र स्वच्छ पीले कपड़े से ढकी चौकी पर रखें।
- जल से भरा कलश चित्र के पास रखें और उसके बगल में ताज़े आंवले रखें।
चरण 3: भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष का पूजन
- दीपक जलाना: भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: चित्र पर चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
- फूल और तुलसी अर्पित करना: प्रभु को ताज़े फूल और तुलसी दल चढ़ाएँ।
- आंवले के वृक्ष का पूजन: पास में आंवले का वृक्ष हो तो वहाँ जाएँ, उसकी जड़ों में जल चढ़ाएँ, तिलक लगाएँ और तने पर कलावा बाँधें। घर पर यही सब आंवले के फलों को अर्पित करें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाएँ हाथ में चावल के कुछ दाने और फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- वेदी के सामने श्रद्धापूर्वक बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति के साथ आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा के बाद दाने और पंखुड़ियाँ प्रभु के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और रात्रि जागरण
- जलते हुए घी के दीपक से भक्ति-गीत गाते हुए भगवान विष्णु की आरती करें।
- फल और मिठाई नैवेद्य के रूप में अर्पित करें और प्रसाद के रूप में बाँटें।
- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें और परिवार की सामर्थ्य के अनुसार शाम और रात को भजन तथा प्रभु के नाम के साथ जागरण करें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना
- अगली सुबह स्नान करें और भगवान विष्णु की संक्षिप्त पूजा करें।
- ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ और दान दें, फिर परिवार के बड़ों के चरण छूकर (चरण स्पर्श) उनका आशीर्वाद लें।
- पारण के समय पर प्रसाद और आंवले के एक टुकड़े सहित सादे सात्विक भोजन से अपना व्रत खोलें।
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