गोगा नवमी 2027

गुरुवार, 26 अगस्त 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • गोगा जी के भक्त: विशेषकर राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के भक्त गोगा जी (जिन्हें जाहर वीर भी कहते हैं) की रक्षा और आशीर्वाद पाने के लिए उपवास और भेंट के साथ उनकी पूजा करते हैं।
  • सर्प भय से रक्षा चाहने वाले परिवार: परिवार सर्पदंश से तथा बच्चों, पशुओं और घर पर आने वाले भय और हानि से रक्षा (सर्प भय निवारण) के लिए गोगा जी से प्रार्थना करते हैं।

पूजा का समय

  • प्रातःकालीन तैयारी: सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में स्नान करें और व्रत आरंभ करें।
  • मुख्य पूजा: सुबह स्नान के बाद, दोपहर से पहले की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • सायं पूजन: सूर्यास्त के बाद शाम को भक्त एकत्र होकर गोगा जी की स्तुति के गीत गाते हैं। (समय परिवारों और गाँवों में अलग-अलग हो सकता है।)

पर्व के बारे में

गोगा नवमी राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में मनाया जाने वाला अत्यंत पूजनीय पर्व है, जो गोगा जी को समर्पित है। वे वीर संत हैं, जिन्हें सर्पों के स्वामी के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (गोगा जी की कथा)

बहुत समय पहले राजस्थान में बाछल नाम की एक रानी थीं, जिन्हें संतान की बड़ी चाह थी। उन्होंने महान योगी गुरु गोरखनाथ से आशीर्वाद माँगा, जिन्होंने उन्हें पवित्र वरदान दिया। उनकी कृपा से एक पुत्र का जन्म हुआ, जो गोगा जी या जाहर वीर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

गोगा जी बड़े होकर वीर और धर्मनिष्ठ राजा बने, जिन्हें प्रजा बहुत चाहती थी। वे गायों, निर्बलों और असहायों की रक्षा के लिए समर्पित थे, और कहा जाता है कि सर्पों पर उनका अधिकार था। जब उनके अपने ही स्वजन उनके विरुद्ध हो गए और तलवारें उठा लीं, तब उन्होंने अपने कर्तव्य और वचन पर अडिग रहते हुए साहस से उनका सामना किया। गुरु गोरखनाथ ने उन्हें सीख दी थी: "धर्म पर अटल रहो, शरण में आने वालों की रक्षा करो और अपना वचन कभी मत तोड़ो।"

गोगा जी जीवन भर इन वचनों पर चले, और अंत में अपने घोड़े सहित धरती में समा गए। उनकी समाधि का स्थान (गोगा मेड़ी) पवित्र तीर्थ बन गया। भक्तों का विश्वास है कि वे अपने पूजने वालों की सर्पों से और हर संकट से रक्षा करते हैं। तभी से भक्त गोगा नवमी पर भेंट चढ़ाकर और उनकी स्तुति के गीत गाकर यह पर्व मनाते हैं।


पूजा सामग्री

प्रातःकालीन पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / प्रतीक: घोड़े पर सवार गोगा जी का चित्र या मिट्टी की मूर्ति, और हो सके तो छड़ी (मोर पंखों और ध्वजा वाली डंडी)
  • तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम और अक्षत
  • दीपक और ज्योति: घी या तेल और रुई की बाती वाला मिट्टी का दीपक, तथा अगरबत्ती
  • जल पात्र: ताज़े जल और कच्चे दूध से भरा छोटा पात्र
  • नैवेद्य: खीर, चूरमा, हलवा, पूरी और मीठे गुलगुले
  • पूजा के अन्य सामान: फूल, कलावा, और नीले या लाल रंग का निशान (ध्वजा)

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे गोगा जी, आज हम यह व्रत रखते हैं और भक्तिभाव से आपकी पूजा करते हैं। हमारे परिवार, हमारे बच्चों और हमारे घर को हर हानि से बचाएँ।"
  3. दिन भर उपवास रखें और पूजा के बाद केवल सादा, सात्विक भोजन करें (व्रत कितनी कठोरता से रखा जाए, यह परिवारों में अलग-अलग होता है)।

चरण 2: पूजा स्थान तैयार करना

  1. घर का पूर्वी भाग या पूजा का स्थान साफ़ करें।
  2. गोगा जी का चित्र या मिट्टी की मूर्ति स्वच्छ कपड़े से ढकी लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें।
  3. छड़ी या निशान को मूर्ति के पास रखें, और जल तथा कच्चे दूध का पात्र तैयार रखें।

चरण 3: पूजन करना

  1. दीपक जलाना: दीपक जलाकर गोगा जी के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: गोगा जी के चित्र को रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और धागा अर्पित करना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और छड़ी या मूर्ति पर कलावा का एक टुकड़ा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पण: भगवान के सामने खीर, चूरमा, हलवा, पूरी और गुलगुले रखें।

चरण 4: कथा सुनना

  1. दाहिने हाथ में थोड़े चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
  2. चौकी के सामने श्रद्धा से बैठकर भक्तिभाव से गोगा जी की कथा सुनें या पढ़ें।
  3. कथा के बाद दाने और पंखुड़ियाँ गोगा जी के चरणों में अर्पित करें।

चरण 5: आरती और दूध अर्पण

  1. जलते हुए दीपक से भक्ति गीत और गोगा जी की स्तुति के गीत गाते हुए गोगा जी की आरती करें।
  2. पास में साँप की बाँबी या दीमक की बाँबी हो, तो उस पर थोड़ा कच्चा दूध चढ़ाएँ, या गोगा जी की मूर्ति के सामने अर्पित करें (जैसी आपके परिवार की परंपरा हो)।
  3. अपने परिवार, बच्चों और पशुओं की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटें।
  3. प्रसाद और सादे, सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

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