जीवित्पुत्रिका 2027

गुरुवार, 23 सितंबर 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • माताएँ: मुख्य रूप से माताएँ अपनी संतान (पुत्र और पुत्री दोनों) के स्वास्थ्य, रक्षा, लंबी आयु और समृद्धि के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं।
  • संतान की इच्छा रखने वाली स्त्रियाँ: नवविवाहित स्त्रियाँ और संतान की आशा रखने वाली स्त्रियाँ भी संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद पाने के लिए यह व्रत करती हैं (संतान प्राप्ति)।

पूजा का समय

  • पिछला दिन: माताएँ स्नान करके व्रत की तैयारी के लिए सादा सात्त्विक भोजन करती हैं (ब्योरे में परिवारों की परंपरा अलग-अलग होती है)।
  • प्रातः संकल्प: संकल्प सुबह ब्रह्म मुहूर्त में लिया जाता है, और फिर पूरे दिन बिना अन्न-जल के व्रत रखा जाता है।
  • पूजा मुहूर्त: जीवित्पुत्रिका की पूजा संध्या को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • पारण (व्रत खोलना): व्रत की तिथि समाप्त होने के बाद अगली सुबह व्रत खोला जाता है।

पर्व के बारे में

जीवित्पुत्रिका, जिसे जितिया भी कहते हैं, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश का एक अत्यंत पूजनीय पर्व है, जिसमें माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु के लिए कठिन उपवास रखती हैं। यह पर्व आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (जीमूतवाहन की कथा)

बहुत समय पहले जीमूतवाहन नाम का एक दयालु और उदार राजकुमार था, जो विद्याधरों के राजा का पुत्र था। उसने अपना राज्य छोड़ दिया और वन में बस गया, जहाँ वह श्रद्धा से अपने पिता की सेवा करता और अपना समय प्रार्थना में बिताता था।

एक दिन उसने एक बूढ़ी नागमाता को फूट-फूटकर रोते देखा। उसने बताया कि प्रतिदिन एक नाग गरुड़ को आहार के रूप में दिया जाता है, और आज उसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है। शोक में डूबी माता को देखकर जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर गया।

उसने माता को सांत्वना दी और कहा: "माँ, मत रोइए। आपके पुत्र की जगह मैं जाऊँगा, ताकि आज कोई माँ अपनी संतान न खोए।" जीमूतवाहन लाल कपड़ा ओढ़कर उस शिला पर लेट गया, जहाँ गरुड़ आने वाले थे। जब गरुड़ आए और उसे पकड़ लिया, तब भी वह चीखा नहीं। उसके साहस और करुणा से गरुड़ चकित रह गए और उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ।

जीमूतवाहन के निःस्वार्थ बलिदान से द्रवित होकर गरुड़ ने उसे छोड़ दिया, नागों को खाना बंद करने का वचन दिया और उसे आशीर्वाद दिया। गरुड़ की कृपा से जो मारे गए थे, वे सब फिर जीवित हो उठे। तभी से माताएँ जीवित्पुत्रिका का व्रत रखती हैं और अपनी संतान की रक्षा और लंबी आयु के लिए जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।


पूजा सामग्री

संध्या की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • प्रतिमा: कुश या मिट्टी से बनी जीमूतवाहन की आकृति
  • तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम और अक्षत
  • दीप: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती
  • जल पात्र: ताज़े जल से भरा एक छोटा कलश
  • नैवेद्य: फल, मिठाई, और उबला चावल या खीर
  • पूजन के अन्य सामान: फूल, कलावा, और गले में पहनने के लिए पवित्र धागा (जिउतिया का धागा)

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो लाल, पीले या गुलाबी रंग के; काले वस्त्र न पहनें)।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान जीमूतवाहन, आज मैं अपनी संतान के स्वास्थ्य, लंबी आयु और कुशल-मंगल के लिए यह व्रत रखती हूँ। मुझे शुद्ध भक्ति के साथ यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
  3. परंपरा के अनुसार पूरे दिन बिना अन्न-जल के व्रत रखें (कठोरता में परिवारों की परंपरा अलग-अलग होती है)।

चरण 2: पूजा स्थान तैयार करना (अपराह्न के बाद)

  1. पूजा का स्थान स्वच्छ करें और लकड़ी की चौकी पर साफ़ कपड़ा बिछाकर उसे रखें।
  2. चौकी पर जीमूतवाहन की कुश या मिट्टी की आकृति रखें।
  3. आकृति के पास स्वच्छ जल से भरा कलश रखें।

चरण 3: संध्याकालीन पूजन विधि

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर जीमूतवाहन के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: आकृति और कलश पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और सूत्र अर्पित करना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और कलश पर कलावा का एक टुकड़ा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: देवता के सामने फल, मिठाई और पका हुआ चावल रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
  2. चौकी के सामने श्रद्धा से बैठकर पूरे ध्यान और भक्ति के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  3. कथा पूरी होने पर चावल और पंखुड़ियाँ जीमूतवाहन के चरणों में अर्पित करें।

चरण 5: आरती और प्रार्थना

  1. जलते घी के दीपक से जीमूतवाहन की आरती करें और भक्ति-भजन गाएँ।
  2. संतान की रक्षा के प्रतीक के रूप में जिउतिया का धागा अपने गले में बाँधें।
  3. अपनी संतान की लंबी आयु और सुख की प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. परिवार के सदस्यों और बच्चों में प्रसाद बाँटें।
  3. अगली सुबह प्रसाद ग्रहण करके और सादा सात्त्विक भोजन करके व्रत खोलें।

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