कार्तिक पूर्णिमा 2026
मंगलवार, 24 नवंबर 2026
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- भगवान शिव और भगवान विष्णु के भक्त: परिवार इस दिन स्नान, उपवास और पूजा करते हैं, ताकि उन्हें आशीर्वाद, पुण्य और पापों से मुक्ति (पाप मुक्ति) मिले।
- तीर्थयात्री और गृहस्थ: जो लोग गंगा में पवित्र स्नान करते हैं और दीपदान तथा दान करते हैं, वे शांति, समृद्धि और पूरे परिवार की खुशहाली के लिए ऐसा करते हैं।
पूजा का समय
- पवित्र स्नान: सुबह तड़के ब्रह्म मुहूर्त में गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी में किया जाता है, अथवा घर पर नहाने के जल में गंगाजल मिलाकर।
- बोइत बंदन (ओडिशा): ओडिशा में भोर के समय कागज़ या केले के तने की छोटी नावें जल में प्रवाहित की जाती हैं।
- मुख्य पूजा मुहूर्त: स्नान के बाद सुबह के समय प्रातःकालीन पूजा और सत्यनारायण कथा होती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- दीपदान: शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में नदी, मंदिर या घर पर दीप जलाए और प्रवाहित किए जाते हैं।
पर्व के बारे में
कार्तिक पूर्णिमा पूरे भारत में मनाया जाने वाला एक अत्यंत पूजनीय पर्व है, जिसमें भक्त पवित्र स्नान करते हैं, दीप जलाते हैं और भगवान शिव तथा भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
व्रत कथा (त्रिपुरासुर की कथा)
एक बार की बात है, तीन शक्तिशाली दैत्य भाइयों, तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने कठोर तपस्या की और भगवान ब्रह्मा से वरदान पाया। उन्होंने सोने, चाँदी और लोहे के तीन उड़ने वाले नगर बनाए, जो मिलकर त्रिपुर कहलाए। उन्हें वरदान मिला था कि जब तीनों नगर एक सीध में आएँगे, तब केवल एक बाण से ही तीनों नष्ट किए जा सकेंगे।
अपनी शक्ति के घमंड में दैत्य देवताओं और ऋषियों को सताने लगे। उन्हें हरा न पाने पर देवता भगवान शिव के पास पहुँचे और अपने कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने सहमति दी। पृथ्वी को रथ, वेदों को घोड़े और मेरु पर्वत को धनुष बनाकर वे तीनों नगरों के एक सीध में आने की प्रतीक्षा करने लगे। जब कार्तिक की पूर्णिमा पर तीनों नगर एक पंक्ति में आए, तब उन्होंने एक ही बाण चलाकर त्रिपुर को भस्म कर दिया। देवताओं ने हर्षित होकर स्वर्ग में दीप जलाए और कहा: "त्रिपुर का नाश करने वाले त्रिपुरारी की जय हो। यह दिन सदा याद रखा जाए।"
तभी से भक्त कार्तिक पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और दीप जलाते हैं, अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाते हैं (वाराणसी में इस दिन को देव दीपावली भी कहते हैं)।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- मूर्ति / चित्र: भगवान शिव और भगवान विष्णु (अथवा सत्यनारायण) का चित्र या मूर्ति
- तिलक और पूजन सामग्री: रोली, चंदन, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और प्रकाश: घी या तेल के कई मिट्टी के दीपक और रुई की बत्तियाँ
- पवित्र जल पात्र: गंगाजल या स्वच्छ जल से भरा कलश या पात्र
- नैवेद्य: पंचामृत, पंजीरी या हलवा, फल और तुलसी दल
- पूजा के अन्य सामान: फूल, बेलपत्र, कलावा और पत्तों या कागज़ की छोटी नावें (ओडिशा में बोइत बंदन के लिए)
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, गंगा या किसी अन्य नदी में पवित्र स्नान करें (या घर पर नहाने के जल में गंगाजल की कुछ बूँदें डालकर नहाएँ) और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान शिव और भगवान विष्णु, आज कार्तिक पूर्णिमा पर हम अपने पापों की शुद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए यह व्रत रखते हैं। शुद्ध भक्ति से इस व्रत को पूरा करने का बल दें।"
- अपने परिवार की परंपरा के अनुसार हल्का उपवास रखें या सादा सात्त्विक आहार लें।
चरण 2: पूजा स्थान तैयार करना (सुबह)
- घर के ईशान कोण या पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
- लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ पीला या सफ़ेद वस्त्र बिछाकर भगवान शिव और भगवान विष्णु के चित्र या मूर्तियाँ स्थापित करें।
- मूर्तियों के पास जल से भरा कलश और नारियल रखें तथा पूजा की सामग्री तैयार रखें।
चरण 3: पूजन विधि
- दीपक जलाना: देवताओं के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: मूर्तियों को चंदन, रोली और अक्षत अर्पित करें।
- फूल और पत्र चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ, भगवान शिव को बेलपत्र और भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें।
- नैवेद्य अर्पित करना: पंचामृत, फल और मीठे पकवान देवताओं के सामने रखें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाहिने हाथ में कुछ चावल के दाने और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
- वेदी के सामने श्रद्धा से बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति से सत्यनारायण कथा या त्रिपुरासुर की कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा पूरी होने पर दाने देवताओं के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और दीपदान (संध्या के दीप)
- जलते हुए घी के दीपक से शिव आरती और विष्णु आरती करें और भक्ति भरे भजन गाएँ।
- शाम को अँधेरा होने पर मंदिर, नदी तट, तुलसी के पौधे के पास और घर के चारों ओर दीप जलाएँ। ओडिशा में बोइत बंदन के लिए दीप रखी हुई छोटी नावें जल में प्रवाहित करें।
- चंद्रमा को प्रणाम करते हुए अंत में परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें।
- ज़रूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करें।
- प्रसाद परिवार के सदस्यों में बाँटें और सादे सात्त्विक भोजन से उपवास खोलें।
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