लाभ पंचमी 2026
शनिवार, 14 नवंबर 2026
पूजा विधि: गुजरात (लाभ पंचम)
यह पूजा कौन करे?
- व्यापारी और दुकानदार: व्यापारी दिवाली के अवकाश के बाद सुबह की पूजा और नए बही-खातों के शुभारंभ के साथ अपनी दुकान और कार्यालय फिर से खोलते हैं, और आने वाले वर्ष में लाभ की कामना करते हैं।
- परिवार: परिवार घर पर गणेश, शिव और लक्ष्मी की पूजा करते हैं, और बहुत से लोग सौभाग्य के लिए शिव और पार्वती की एक साथ पूजा करते हैं।
- विद्यार्थी: कुछ स्थानों पर इस दिन सरस्वती की पूजा की जाती है और लोग अपनी पुस्तकों की भी पूजा करते हैं, और ज्ञान की कामना करते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजा से पहले सूर्य को अर्घ्य दें।
- पूजा मुहूर्त: पूजा सुबह के मुहूर्त में, शुभ चौघड़िया (दिन का एक शुभ भाग; कुछ परिवार लाभ, अमृत या चल का भी प्रयोग करते हैं) में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- बही-खाता और दुकान खोलना: नया बही-खाता और दुकान या कार्यालय पूजा के बाद, उसी सुबह खोले जाते हैं।
- नियमित काम: बहुत से गुजराती परिवार आज मुहूर्त करते हैं, पर नियमित काम अष्टमी तिथि से या उसके बाद शुरू करते हैं।
पर्व के बारे में
लाभ पंचम, जिसे सौभाग्य पंचमी भी कहते हैं, गुजरात का एक अत्यंत प्रिय पर्व है, जो दिवाली के समापन और नए वर्ष के पहले कामकाजी दिन का प्रतीक है; इस दिन व्यापारी अपना कारोबार फिर से खोलते हैं और परिवार लाभ तथा सौभाग्य की प्रार्थना करते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- प्रातःकाल और कलश: अर्घ्य के लिए जल का पात्र, लाल वस्त्र, रंगोली के रंग, जल से भरा तांबे या मिट्टी का कलश, सुपारी, एक सिक्का और आम के पत्ते
- तिलक और दीपक: चंदन, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और घी का दीपक
- गणेश के लिए: गणेश की प्रतिमा, एक सुपारी, गणेश बनाने के लिए कलावा और चावल, सिंदूर, दूर्वा और मोदक
- शिव के लिए: शिव की प्रतिमा, भस्म, बिल्व पत्र, धतूरे के फूल, सफ़ेद वस्त्र और दूध से बनी मिठाई
- लक्ष्मी के लिए: लक्ष्मी की प्रतिमा, सुगंध या अगर, कमल का फूल, सफ़ेद मिठाई, और हलवा-पूड़ी
- बही-खाता और प्रसाद: नया बही-खाता (चोपड़ा), स्वस्तिक के लिए चंदन और कुमकुम, तथा लड्डू और पेड़े जैसी मिठाइयाँ, फल और खील-बताशे
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और अर्घ्य (भोर में)
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- लाल वस्त्र पहनें, जैसा बहुत से परिवार करते हैं।
- सूर्य को अर्घ्य (जल चढ़ाना) दें।
- कुछ भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी और देवताओं की स्थापना (प्रातःकाल के मुहूर्त में)
- अपने घर या कार्यस्थल के पूजा स्थान को साफ़ करें, रंगोली बनाएँ, स्वस्तिक बनाएँ और दीपक जलाएँ।
- जल से भरा कलश रखें, उसमें सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते डालें।
- शुभ चौघड़िया में गणेश, शिव और लक्ष्मी को स्थापित करें।
- एक सुपारी पर कलावा लपेटें, उसे चावल के गोल ढेर पर गणेश के रूप में रखें, और हो सके तो उस पर गणेश की प्रतिमा रखें।
चरण 3: पूजन अर्पित करना
- तिलक और धूप अर्पित करना: देवताओं को चंदन, कुमकुम, अक्षत, फूल और धूप अर्पित करें, और उनके सामने घी का दीपक जलाए रखें।
- गणेश की पूजा: गणेश को चंदन, सिंदूर, फूल, दूर्वा और मोदक अर्पित करें।
- शिव की पूजा: शिव को भस्म, बिल्व पत्र, धतूरे के फूल और सफ़ेद वस्त्र अर्पित करें, और दूध से प्रसाद बनाएँ।
- लक्ष्मी की पूजा: लक्ष्मी को सुगंध या अगर, कमल और सफ़ेद मिठाई अर्पित करें, और हलवा-पूड़ी का भोग लगाएँ।
चरण 4: मंत्रों का जाप
- "ॐ गं गणपतये नमः" का 108 बार जाप करें।
- "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः" का 108 बार जाप करें।
- सौभाग्य के लिए लक्ष्मी से "ॐ श्रीं श्रीं लक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा" कहकर प्रार्थना करें।
चरण 5: नया बही-खाता खोलना
- व्यापारी नया बही-खाता खोलें। पहले पन्ने पर बाईं ओर "शुभ" और दाईं ओर "लाभ" लिखें, और बीच में स्वस्तिक बनाएँ।
- स्वस्तिक और श्री के लिए चंदन और कुमकुम का प्रयोग करें।
- यदि आप दिवाली पर लक्ष्मी पूजा या बही-खाते की पूजा न कर पाए हों, तो उसे आज करें (पूरी विधि के लिए चोपड़ा पूजन की मार्गदर्शिका देखें)।
- पूजा के बाद अपनी दुकान या कार्यालय खोलें और काम शुरू करें।
चरण 6: आरती और प्रसाद
- लक्ष्मी की आरती और गणेश की आरती करें।
- लड्डू और पेड़े जैसी मिठाइयाँ, फल और खील-बताशे प्रसाद के रूप में अर्पित करें।
- प्रसाद बाँटें।
चरण 7: दान और भेंट
- ज़रूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन का दान दें।
- मिठाई और उपहार लेकर मित्रों और संबंधियों से मिलने जाएँ।
पूजा विधि: जैन (ज्ञान पंचमी)
यह पूजा कौन करे?
- श्वेतांबर जैन परिवार: श्वेतांबर जैन परिवार, विशेषकर गुजरात में, इस दिन ज्ञान का सम्मान करते हुए शास्त्रों और प्राचीन पांडुलिपियों की पूजा करते हैं।
- व्रत धारण करने वाले: जिन श्रद्धालुओं ने व्रत लिया है, वे प्रत्येक शुक्ल पंचमी पर पाँच वर्ष और पाँच मास तक, या कम से कम हर वर्ष इस दिन, उपवास या आयंबिल (बिना स्वाद का एक समय का भोजन) करते हैं।
- बच्चे और विद्यार्थी: बच्चे पुस्तकों के सामने कागज़ और कलम रखकर अपनी पढ़ाई का आरंभ (विद्यारंभ) करते हैं।
पर्व के बारे में
ज्ञान पंचमी (ज्ञान पंचम), जिसे जैन समाज में लाभ पंचम भी कहते हैं, श्वेतांबर जैनों का ज्ञान का पर्व है, जिसमें शास्त्रों और प्राचीन पांडुलिपियों की पूजा की जाती है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। दिगंबर जैन इसी प्रकार का श्रुत पंचमी पर्व ज्येष्ठ मास में मनाते हैं।
कथा (वरदत्त और गुणमंजरी की कथा)
बहुत समय पहले की बात है, अजित सिंह नाम के एक राजा का पुत्र वरदत्त था, जिसे कितना भी पढ़ाया जाए, एक भी पाठ याद नहीं रहता था। पास के नगर में सिंहदास नाम का एक धनी व्यापारी रहता था, जिसकी पुत्री बोल नहीं सकती थी और अनेक रोगों से पीड़ित थी।
फिर राजकुमार का शरीर चर्म रोग से भर गया, और कोई भी व्यापारी की पुत्री से विवाह करने को तैयार नहीं था।
एक आदरणीय गुरु उस नगर में पधारे और लोगों को उपदेश दिया: "जो लोग मन से ज्ञान का अनादर करते हैं, उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है; जो वाणी से अनादर करते हैं, उनकी वाणी चली जाती है; और जो कर्म से अनादर करते हैं, वे रोगी हो जाते हैं। ज्ञान पंचमी की आराधना करो।" उन्होंने व्यापारी को बताया कि पिछले जन्म में उसकी पुत्री एक माता थी, जिसने अपने पुत्रों का पक्ष लेकर उनके शिक्षक का विरोध किया और क्रोध में उनकी पुस्तकें जला दीं, जिससे बच्चे अनपढ़ रह गए। राजा को उन्होंने बताया कि उसका पुत्र पिछले जन्म में वसुदेव नाम का विद्वान मुनि था, जो शिष्यों की शंकाओं का उत्तर देते-देते थक गया, उसने निश्चय किया कि वह न कभी पढ़ेगा, न पढ़ाएगा, और बारह वर्ष तक मौन रहा।
दोनों को अपने पिछले जन्म याद आ गए और उन्होंने ज्ञान पंचमी की आराधना की। वे रोगमुक्त हो गए, उन्होंने दीक्षा ली, देवलोक में देवता के रूप में जन्मे और समय आने पर मोक्ष को प्राप्त हुए। तभी से जैन परिवार ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ ज्ञान पंचमी मनाते हैं।
पूजा सामग्री
पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- शास्त्र: शास्त्र या कोई धार्मिक पुस्तक
- वासक्षेप: शास्त्रों पर छिड़कने के लिए चंदन का चूर्ण (वासक्षेप)
- स्वस्तिक के लिए: 51 स्वस्तिक बनाने के लिए चावल
- जाप के लिए: नवकारवाली (माला)
- कागज़ और कलम: कोरा कागज़, कलम या बिना छीली पेंसिलें, और कॉपियाँ
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: घर की सफ़ाई और उपवास
- घर की सफ़ाई करें और पूजा तथा जाप की तैयारी करें।
- यदि आपने व्रत लिया है, तो उपवास करें या आयंबिल (बिना स्वाद का एक समय का भोजन) करें।
- कुछ श्रद्धालु उपवास मौन रहकर करते हैं।
- यह व्रत प्रत्येक शुक्ल पंचमी पर पाँच वर्ष और पाँच मास तक, या कम से कम हर वर्ष इस दिन किया जाता है।
चरण 2: देरासर, उपाश्रय या भंडार में शास्त्र पूजा
- देरासर (जैन मंदिर), उपाश्रय या भंडार (पांडुलिपियों का संग्रह) में शास्त्र और प्राचीन पांडुलिपियाँ मेज़ों पर रखी जाती हैं।
- उन पर वासक्षेप (चंदन का चूर्ण) छिड़कें, जैसे जिन प्रतिमाओं पर छिड़का जाता है।
- भंडारों में रखी प्राचीन पांडुलिपियों के दर्शन करें।
- जहाँ भंडार है, वहाँ इस दिन उसकी पुस्तकों की सफ़ाई की जाती है और सूचियाँ नई की जाती हैं।
चरण 3: कागज़, कलम और पढ़ाई का आरंभ
- कोरे कागज़ और बिना छीली पेंसिलों की भी पूजा करें।
- बच्चों से पुस्तकों के सामने कागज़ और कलम रखवाकर उनकी पढ़ाई का आरंभ कराएँ।
- बच्चे पेंसिलें और कॉपियाँ खरीदते हैं और भजन या मंत्र लिखते हैं।
चरण 4: स्वस्तिक, खमासमण और जाप
- 51 स्वस्तिक बनाएँ।
- 51 खमासमण करें।
- 51 लोगस्स का कायोत्सर्ग करें।
- "नमो नाणस्स" का जाप करें, 20 नवकारवाली।
चरण 5: देववंदन, प्रतिक्रमण और मंदिरों की परिक्रमा
- देववंदन और प्रतिक्रमण करें।
- कुछ श्रद्धालु आस-पास के मंदिरों की परिक्रमा करते हैं और हर मंदिर में पाँच ज्ञानों में से एक का सम्मान करते हैं: मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यव और केवल।
चरण 6: प्रवचन, गुरुजन और स्तवन
- व्रत पर साधु-साध्वियों का प्रवचन सुनें और उनका सम्मान करें, क्योंकि इस दिन को गुरु पंचमी भी कहते हैं।
- कुछ श्रद्धालु सरस्वती की श्रुतदेवता के रूप में पूजा करते हैं।
- इस दिन के स्तवन, चैत्यवंदन, स्तुति और सज्झाय गाएँ, जैसे ज्ञान पंचमी का वह स्तवन जिसकी प्रारंभिक पंक्ति है: "न्यान बड़उ संसार, न्यान मुगति दातार" (ज्ञान संसार में महान है, ज्ञान मुक्ति देने वाला है)।
चरण 7: दिन का संकल्प
- अगली ज्ञान पंचमी तक कुछ नया सीखने का संकल्प लें, जैसे सामायिक या प्रतिक्रमण कंठस्थ करना।
- इस पर्व का उद्देश्य याद रखें: ज्ञानावरणीय कर्म (ज्ञान को ढकने वाला कर्म) का क्षय करना।
पूजा विधि: महाराष्ट्र (पांडव पंचमी)
यह पूजा कौन करे?
- विवाहित स्त्रियाँ: विवाहित स्त्रियाँ इस दिन पाँचों पांडवों की पूजा करती हैं और गुणवान, आज्ञाकारी तथा बलवान संतान की कामना करती हैं (संतान प्राप्ति)।
- परिवार: महाराष्ट्र के परिवार इस दिन को घर पर मनाते हैं, गोबर से पाँच पांडव बनाते हैं और उनके साथ भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं।
पूजा का समय
- पूजा मुहूर्त: पांडव पंचमी की पूजा सुबह, सूर्योदय के बाद की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
पर्व के बारे में
पांडव पंचमी महाराष्ट्र के घरों में मनाया जाने वाला पर्व है, जिसमें परिवार पाँचों पांडवों के एक वर्ष के अज्ञातवास से प्रकट होने का स्मरण करते हैं और भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।
कथा (पांडवों के अज्ञातवास से प्रकट होने की कथा)
जुए में हार जाने पर पाँचों पांडवों ने बारह वर्ष वन में बिताए और फिर एक वर्ष अज्ञातवास में रहे, वेश बदलकर, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को उनकी अवधि पूरी हुई और वे अज्ञातवास से प्रकट हुए। उसी दिन अर्जुन विराट के राज्य की रक्षा के लिए कौरव सेना के सामने आए, और भीष्म ने दुर्योधन को स्मरण कराया कि पांडव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का वेश बदलकर रहना पूरा कर चुके हैं।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- द्वार: रंगोली के रंग, और रंगोली के सामने रखने के लिए पाट या चौरंग (छोटी चौकी)
- पाँच पांडव: सुबह का ताज़ा गोबर और पाँच पत्ते
- निवडुंग और दीपक: निवडुंग (कैक्टस) के पौधे की डंडियाँ, और कुएँ या पास के जलस्रोत के लिए एक दीपक
- नैवेद्य: मक्खन (लोणी) और खड़ी शक्कर
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: द्वार की तैयारी (सूर्योदय के बाद)
- सूर्योदय के बाद घर के द्वार पर रंगोली बनाएँ।
- रंगोली के सामने पाट या चौरंग रखें।
- उस पर पाँच पत्ते बिछाएँ।
चरण 2: पाँच पांडवों की आकृति बनाना
- सुबह के ताज़े गोबर के पाँच गोले लें और हर पत्ते पर एक गोला रखें, पाँच पांडवों के रूप में।
- गोलों में निवडुंग के पौधे की एक-एक डंडी लगाएँ, उनके दीपक के रूप में।
- कुएँ या पास के जलस्रोत के पास एक दीपक रखें।
चरण 3: पांडवों और कृष्ण की पूजा
- पाँचों पांडवों में से हर एक की पूजा करें। विवाहित स्त्रियाँ गुणवान, आज्ञाकारी और बलवान संतान की कामना करें।
- भगवान कृष्ण की भी पूजा करें और उनका नाम जपें।
चरण 4: नैवेद्य अर्पित करना
- मक्खन और खड़ी शक्कर का नैवेद्य अर्पित करें।
- यदि आप ऐसी जगह रहते हैं जहाँ गोबर नहीं मिलता, तो भगवान कृष्ण की पूजा करें, नैवेद्य अर्पित करें और मन ही मन पांडवों का स्मरण करें (मानस पूजा)।
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