गोपाष्टमी 2026
मंगलवार, 17 नवंबर 2026
पूजा विधि: ब्रज और उत्तर भारत
यह पूजा कौन करे?
- गाय वाले परिवार: जिन परिवारों के घर गाय है, वे गाय और उसके बछड़े को नहलाते, सजाते और उनकी पूजा करते हैं (गौ पूजा), और भगवान कृष्ण को गोपाल, यानी गायों के पालक के रूप में पूजते हैं। कुछ भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं।
- जिनके घर गाय नहीं है: जिन भक्तों के घर गाय नहीं है, वे गौशाला में जाकर वहाँ की गायों की पूजा करते हैं और गौशाला को भोजन तथा अन्य सामग्री देते हैं।
- महिलाएँ और कृष्ण भक्त: महिलाएँ भगवान कृष्ण की भी पूजा करती हैं और गाय को तिलक लगाती हैं, और भजन गाए जाते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन पूजा: गाय और उसके बछड़े को सुबह, सूर्योदय के बाद, नहलाकर उनकी पूजा की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- गायों के साथ चलना: पूजा के बाद जब गायों को चरने के लिए ले जाया जाए, तो उनके साथ कुछ दूर पैदल चलें।
- सायंकालीन पूजा (गोधूलि वेला): शाम को जब गायें घर लौटती हैं (गोधूलि), तब उनकी फिर से पूजा की जाती है। अपने शहर का गोधूलि मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
पर्व के बारे में
गोपाष्टमी ब्रज (मथुरा और वृंदावन) का एक अत्यंत पूजनीय पर्व है, जो अब पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है, जिसमें गायों और बछड़ों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है और भगवान कृष्ण को गोपाल के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। महाराष्ट्र में गाय और बछड़े की पूजा गोवत्स द्वादशी को होती है; उसके लिए वसु बारस की मार्गदर्शिका देखें।
कथा (श्रीकृष्ण के गायों के साथ पहले दिन की कथा)
बहुत समय पहले की बात है, ब्रज में नन्हे कृष्ण केवल बछड़ों को चराते थे। अपने जीवन के छठे वर्ष में उन्होंने माता यशोदा से कहा कि अब वे बड़े हो गए हैं और बछड़ों को नहीं, गायों को चराएँगे। यशोदा मान गईं, पर उन्होंने कृष्ण को अनुमति के लिए पिता नंद बाबा के पास भेजा।
नंद बाबा शांडिल्य ऋषि के पास गए और कृष्ण को गायों के साथ भेजने के लिए शुभ मुहूर्त पूछा। चकित ऋषि ने कहा कि अगले वर्ष तक इस क्षण के अलावा कोई और मुहूर्त नहीं है, और वह दिन गोपाष्टमी का था।
यशोदा ने कृष्ण को सुंदर वस्त्रों से सजाया, सिर पर मोरपंख का मुकुट पहनाया, पैरों में घुँघरू बाँधे और पहनने के लिए उन्हें पादुकाएँ दीं। कृष्ण ने उन्हें पहनने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे इन्हें तभी पहनेंगे जब यशोदा सभी गायों के पैरों में भी पादुकाएँ बाँधेंगी।
उनकी बात से भावुक होकर यशोदा ने उन्हें जाने दिया, और कृष्ण नंगे पैर गायों के साथ चल पड़े। गायों को चराने के कारण वे गोपाल और गोविंद कहलाते हैं। तभी से गोपाष्टमी उनके गायों के साथ पहले दिन की स्मृति में मनाई जाती है।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- शुद्धि और प्रतिमाएँ: स्थान की शुद्धि के लिए गंगाजल या गोबर, और कृष्ण तथा गौ माता का चित्र या प्रतिमा
- प्रतिमाओं के लिए: गंगाजल, चंदन, कुमकुम, देसी घी का दीपक, तुलसी, फल, फूल और घर की बनी मिठाई
- गाय और बछड़े को सजाने के लिए: घुँघरू, सींगों के लिए चुनरी का पट्टा, हल्दी, कुमकुम, रोली, चंदन और फूलों की मालाएँ
- चरणों में अर्पण के लिए: एक छोटे पात्र में जल, चावल, सफ़ेद तिल और फूल
- गाय के भोजन के लिए: हरा चारा, हरा मटर, गुड़, रोटी, चना, और केला, सेब जैसे फल
- ग्वालों और गौशाला के लिए: ग्वालों के लिए नए वस्त्र और दक्षिणा; गौशाला के लिए गंगाजल, फूल, दीपक, गुड़ और भोजन
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- व्रत और पूजा करने का संकल्प लें।
- घर की सफ़ाई करें और पूजा के स्थान को गंगाजल या गोबर से शुद्ध करें।
- कृष्ण और गौ माता का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।
चरण 2: कृष्ण और गौ माता की पूजा
- प्रतिमाओं को गंगाजल से स्नान कराएँ और चंदन-कुमकुम का तिलक लगाएँ।
- उनके सामने देसी घी का दीपक जलाएँ।
- तुलसी, फल, फूल और घर की बनी मिठाई अर्पित करें।
चरण 3: गाय और बछड़े को नहलाना और सजाना (प्रातःकाल)
- गाय और उसके बछड़े को नहलाएँ।
- उनके पैरों में घुँघरू और सींगों पर चुनरी का पट्टा बाँधकर सजाएँ।
- सींगों पर हल्दी, कुमकुम लगाएँ और फूलों की माला पहनाएँ।
- माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाएँ और फूल अर्पित करें।
चरण 4: चरणों में अर्पण और भोजन
- गुजरात की परंपरा में, एक छोटे पात्र में जल, चावल, सफ़ेद तिल और फूल मिलाएँ।
- इसे गाय के चरणों में अर्पित करें और यह मंत्र बोलें: "क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः॥"
- उसे हरा चारा, हरा मटर और गुड़ खिलाएँ, साथ में रोटी, चना, केला या सेब दें।
- उसे जबरदस्ती न खिलाएँ; आराम से खाने दें।
चरण 5: आरती, मंत्र और परिक्रमा
- जलते घी के दीपक से गौ आरती करें, आरती श्री गैय्या मैंय्या की गाएँ, और "गोमाता की जय" तथा "गोपाल गोविंद जय जय" बोलें।
- दिन का मंत्र बोलें: "लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थ मम पापं व्यपोहतु॥"
- गाय की परिक्रमा करें, फिर उसके चरण छुएँ और चरणों की धूल माथे पर लगाएँ।
- गायों के साथ कुछ दूर पैदल चलें, और फिर उन्हें चरने के लिए ले जाएँ।
चरण 6: दक्षिणा, सायंकालीन पूजा और गौशाला
- ग्वालों को दक्षिणा दें, और बहुत से परिवार उन्हें नए वस्त्र देकर तिलक भी लगाते हैं।
- शाम को जब गायें घर लौटती हैं, तब उनकी फिर से पूजा करें और उन्हें अच्छा भोजन दें।
- यदि आपके घर गाय नहीं है, तो गौशाला जाएँ, गंगाजल और फूलों से गायों की पूजा करें, दीपक जलाएँ, उन्हें गुड़ खिलाएँ, और गौशाला को भोजन तथा अन्य सामग्री दें।
- बंगाल के गौशाला मेलों में भक्त अपने वज़न के बराबर चारा देते हैं (तुलादान), और गायों को छप्पन भोग अर्पित किया जाता है।
पूजा विधि: गौड़ीय वैष्णव
यह पूजा कौन करे?
- गौड़ीय वैष्णव भक्त: गौड़ीय वैष्णव परंपरा के भक्त, मायापुर, बंगाल और इस्कॉन के मंदिरों में, इस दिन दर्शन, कथा और गोशाला में गायों की पूजा के साथ यह पर्व मनाते हैं।
- बच्चे: बच्चे, सभी भक्तों के साथ, गोप और गोपियों (ब्रज के ग्वाल-बालकों और गोपिकाओं) की वेशभूषा पहनते हैं और उत्सव में शामिल होते हैं।
पूजा का समय
- पूरा दिन: यह उत्सव पूरे दिन मनाया जाता है। अपने शहर का अष्टमी तिथि का समय इसी पृष्ठ पर देखें।
- आरंभ का यज्ञ: दिन का आरंभ अग्नि यज्ञ से होता है।
- संध्या: संध्या के समय दामोदराष्टकम का गान किया जाता है।
पर्व के बारे में
गोपाष्टमी गौड़ीय वैष्णवों का एक अत्यंत प्रिय पर्व है, जिसे मायापुर और इस्कॉन के मंदिरों में विशेष उल्लास से मनाया जाता है, और जिस दिन भक्त उस दिन को याद करते हैं जब भगवान कृष्ण ने बछड़ों को चराने के बाद गायों को चराना आरंभ किया। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
कथा (राधारानी और ग्वालों की कथा)
बहुत समय पहले की बात है, ब्रज में कृष्ण और बलराम गायों को चराने योग्य हुए, और नंद महाराज तथा ब्रज के बड़ों ने गायें उनकी देखरेख में सौंप दीं। तब तक कृष्ण बछड़ों को चराते थे, और उसी दिन से वे गोपाल बनकर गायों के रखवाले हुए।
यह उत्सव ग्वाल पुरुषों और बालकों के लिए था, परंतु श्रीमती राधारानी भी इसका आनंद लेना चाहती थीं। वे ग्वाल सुबल, कृष्ण के सखा, से मिलती-जुलती थीं, इसलिए उन्होंने उनकी धोती और अन्य वस्त्र पहने और ग्वालों के बीच कृष्ण के साथ जा मिलीं। अन्य गोपियाँ भी साथ हो लीं।
तभी से वृंदावन और अन्य स्थानों के मंदिरों में गोपाष्टमी पर श्रीमती राधारानी को ग्वाल-बालक के वेश में सजाया जाता है।
पूजा सामग्री
दिन का उत्सव शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- विग्रहों के वस्त्र: श्री राधा-माधव के नए वस्त्र, और श्रीमती राधारानी के लिए ग्वाल-बालक की पोशाक
- गोशाला की सजावट: गोशाला में लगाने के लिए वस्त्र और मालाएँ
- गायों के लिए भोजन: केले, पत्तागोभी के पत्ते, अनाज के गोले और विशेष लड्डू
- भक्तों के लिए वेशभूषा: बच्चों और भक्तों के लिए गोप और गोपियों की वेशभूषा
- प्रसाद का भोज: सब्ज़ियाँ, नमकीन चावल, पूड़ी, हलवा और मीठे चावल
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: राधा-माधव के दर्शन
- श्री राधा-माधव के उन नए वस्त्रों में दर्शन करें, जो इस दिन उन्हें धारण कराए जाते हैं।
- श्रीमती राधारानी के दर्शन करें, जो सुबल के वस्त्रों में ग्वाल-बालक के वेश में सजी होती हैं।
- राधारानी और गोपियों के कमल चरणों के चरण दर्शन करें, जो इस दिन दिखाए जाते हैं।
चरण 2: गोशाला की तैयारी
- गोशाला की सफ़ाई करें और उसे वस्त्र और मालाओं से सजाएँ; भक्त कई दिन पहले से इसी प्रकार उसे सजाते हैं।
- गायों को नहलाएँ और साफ़ करें।
- श्री कृष्ण-बलराम की गोशाला तक जाने वाली शोभायात्रा में शामिल हों।
चरण 3: अग्नि यज्ञ और कथा
- अग्नि यज्ञ में बैठें, जो कृष्ण के गायों को चराने की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
- गायों के साथ कृष्ण की लीलाओं की कथा सुनें।
- गौ-रक्षा पर होने वाले प्रवचन सुनें।
चरण 4: गो-पूजा, गायों की आरती और भोजन
- गो-पूजा करें और गायों की परिक्रमा करें, जैसे ब्रजवासी कृष्ण और बलराम के साथ करते थे।
- गायों की विशेष आरती में शामिल हों।
- गायों को केले, पत्तागोभी के पत्ते और अनाज के गोले खिलाएँ।
- उन्हें विशेष लड्डू दें।
चरण 5: गोप-गोपी वेशभूषा और भोज
- गोप या गोपी की वेशभूषा पहनें, और बच्चों को भी पहनाएँ।
- प्रसाद (भगवान को अर्पित भोजन) के भोज में शामिल हों: सब्ज़ियाँ, नमकीन चावल, पूड़ी, हलवा और मीठे चावल।
चरण 6: संध्या और तीन आचार्य (संध्या)
- संध्या के समय दामोदराष्टकम के गान में शामिल हों।
- याद रखें कि यही दिन श्री गदाधर दास गोस्वामी, श्री धनंजय पंडित और श्री श्रीनिवास आचार्य का तिरोभाव दिवस भी है।
पूजा विधि: पुष्टिमार्ग
यह पूजा कौन करे?
- पुष्टिमार्गीय वैष्णव: पुष्टिमार्ग के अनुयायी इस दिन गौशाला जाकर गायों को चारा, घास और लड्डू खिलाते हैं।
- श्रीनाथजी के भक्त: भक्त नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर और पुष्टिमार्ग के मंदिरों में दिन की सेवा के दर्शन करते हैं, जहाँ कुन्नवारा मनोरथ अर्पित किया जाता है।
पूजा का समय
- दिन: गोपाष्टमी का कोई अलग पूजा मुहूर्त नहीं है; सेवा पूरे दिन मंदिर के दर्शनों के क्रम से चलती है। अपने शहर की तिथि इसी पृष्ठ पर देखें।
- मंगला दर्शन: मंगला में पद "प्रथम गौचारण को दिन आज" (आज गायों को चराने का पहला दिन है) गाया जाता है।
- उत्थापन दर्शन: नाथद्वारा की गौशाला में उत्थापन दर्शन के बाद भैंसों की लड़ाई कराई जाती है।
- संध्या आरती: संध्या आरती के बाद सामने खड़ी गायों को विदा किया जाता है।
पर्व के बारे में
गोपाष्टमी पुष्टिमार्ग का एक अत्यंत प्रिय पर्व है, जो नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर और पुष्टिमार्ग के मंदिरों में मनाया जाता है और उस दिन का स्मरण कराता है जब कन्हैया पहली बार गायों को चराने गए। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
कथा (कन्हैया के पहले गोचारण की कथा)
जब कन्हैया पाँच वर्ष के हुए, तब उन्होंने गायों को चराने की ज़िद की, पर उनकी माता ने मना कर दिया। उनकी इच्छा के कारण नंदरायजी ने अक्षय तृतीया को उनका मुंडन कराया। अन्नकूट के दिन गोचारण का शकुन हुआ, पर कन्हैया संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ही गायों को चराने की ज़िद की।
उन्होंने माता से कहा: "माँ, अब मैं बड़ा हो गया हूँ, मुझे डर नहीं लगता, मेरे सभी सखा और बलराम भी मेरे साथ हैं, इसलिए आप चिंता न करें।" यशोदा मान गईं। उन्होंने कन्हैया को मुकुट-काछनी शृंगार धराया, नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाया और उनके पहले गोचारण की आरती उतारी।
उन्होंने कन्हैया से कहा कि वन में और जल के पास न जाएँ, मित्रों से झगड़ा न करें और समय पर भोजन कर लें। उन्होंने बलराम और श्रीदामा से भी कहा कि कन्हैया का ध्यान रखें।
उस दिन श्रीकृष्ण को "गोप" की उपाधि मिली। तभी से यह दिन गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
पूजा सामग्री
घर की भेंट गौशाला की गायों के लिए है; कुन्नवारा मंदिर में अर्पित किया जाता है:
- गायों के लिए: गौशाला में गायों को खिलाने के लिए चारा, घास और लड्डू
- कुन्नवारा भोग (मंदिर में): सोने या चाँदी के नहीं, मिट्टी के पात्र, जिनमें पटिया (गेहूँ के आटे के लड्डू), खीर, मठरी, गेहूँ के आटे का सीरा, दही-भात और गोरस (दूध से बने पदार्थ) हों, सामग्री चार की गुणना में
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: पिछवाई और शृंगार के दर्शन
- काली भूमि पर श्वेत गायों वाली पिछवाई के दर्शन करें ("पिछवाई स्याम धरती पे स्वेत गाय की")।
- मुकुट-काछनी शृंगार के दर्शन करें, जो आज इस ऋतु में अंतिम बार धराया जाता है।
चरण 2: दिन के पद
- दिन के पद सुनें: मंगला में "प्रथम गौचारण को दिन आज", और राजभोग में "नीके नीके री गुपाल माई चलत"।
- आरती में "लटकत चलत जुवती सुखदानी", और शयन में "घेनन को ध्यान निस दिन"।
- मान में "बोलत काहे नागर बेना", और पोढ़वे में "पोढ रहो घनश्याम बलैया ले हो"।
- गोविंद स्वामी का पद "गोविंद चले चरावन धेनु" भी सुनें।
चरण 3: कुन्नवारा मनोरथ
- पुष्टिमार्ग के सभी मंदिरों में कुन्नवारा मनोरथ अर्पित किया जाता है: प्रभु का ग्वालबालों के साथ वन में भोजन।
- भोग मिट्टी के पात्रों में रखा जाता है, सोने के पात्रों में नहीं।
- सामग्री चार की गुणना में होती है, जैसे पटिया, खीर, मठरी, सीरा, दही-भात और गोरस।
चरण 4: गौशाला जाना
- गौशाला जाकर गायों को चारा, घास और लड्डू खिलाएँ।
- नाथद्वारा की गौशाला में उत्थापन दर्शन के बाद भैंसों की लड़ाई कराई जाती है।
चरण 5: गायों की विदाई (संध्या आरती)
- संध्या आरती के बाद सामने खड़ी गायों को विदा किया जाता है ("आरती पीछे सन्मुख की गाये विदा होवे")।
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