अक्षय तृतीया 2027
रविवार, 9 मई 2027
पूजा विधि
यह पूजा कौन करे?
- गृहस्थ: परिवार इस दिन स्थायी समृद्धि, सौभाग्य तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के आशीर्वाद के लिए यह पर्व मनाते हैं।
- पुण्य की कामना रखने वाले श्रद्धालु: जो लोग इस दिन दान करते हैं, पवित्र जल में स्नान करते हैं और जप करते हैं, वे कभी क्षीण न होने वाले पुण्य (अक्षय पुण्य) की कामना करते हैं।
- किसान: ओडिशा और अन्य कृषि प्रधान क्षेत्रों में किसान इसी दिन अच्छी फ़सल की प्रार्थना करते हुए बुवाई का आरंभ करते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन स्नान और संकल्प: सवेरे जल्दी, ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय के समय।
- पूजा मुहूर्त: अक्षय तृतीया की पूजा प्रातःकाल पूर्वाह्न में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- दान और खरीदारी: दान और सोने या नए बर्तन जैसी शुभ खरीदारी पूजा के बाद दिन भर की जाती है।
पर्व के बारे में
अक्षय तृतीया हिंदू वर्ष के सबसे शुभ दिनों में से एक है, जो पूरे भारत में समृद्धि, दान और नए आरंभ के दिन के रूप में मनाई जाती है। गुजरात और राजस्थान में इसे आखा तीज कहा जाता है। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।
कथा (धर्मदास की कथा)
बहुत पहले धर्मदास नाम का एक गरीब पर धर्मनिष्ठ व्यापारी रहता था। वह देवताओं का परम भक्त था, लेन-देन में ईमानदार था और दूसरों की सहायता के लिए सदा तैयार रहता था, यद्यपि उसके पास अपना धन बहुत कम था।
एक दिन उसने सुना कि अक्षय तृतीया पर दान देने से कभी समाप्त न होने वाला पुण्य मिलता है। वह दान करना चाहता था, पर उसका परिवार गरीब था और उसकी पत्नी तथा संबंधियों ने कहा कि वह इतना दान नहीं कर सकता। धर्मदास ने हिम्मत नहीं हारी।
अक्षय तृतीया के दिन वह सवेरे उठा, गंगा में स्नान किया और भगवान विष्णु की पूजा की। फिर पूरी श्रद्धा से उसने जो कुछ उसके पास था, वह ज़रूरतमंदों को दे दिया: जल के घड़े, जौ, गेहूँ, सत्तू और भोजन। उसके परिवार को चिंता हुई कि वह अपना सर्वनाश कर रहा है, पर वह अपनी भक्ति में अडिग रहा और डर के कारण कुछ भी बचाकर नहीं रखा।
उसके निःस्वार्थ दान से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे आशीर्वाद दिया। अगले जन्म में धर्मदास एक पराक्रमी और उदार राजा के रूप में जन्मा, जिसने अपार धन, सत्ता और कीर्ति पाई। तभी से श्रद्धालु अक्षय तृतीया पर दान करते और भगवान विष्णु की पूजा करते आ रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि इस दिन किया गया हर शुभ कर्म अनंत रूप से बढ़ता है।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का चित्र या मूर्ति
- तिलक और पूजन सामग्री: चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और धूप: घी और रुई की बाती सहित दीपक, तथा धूप या अगरबत्ती
- जल पात्र: ताज़े जल से भरा कलश, जिस पर आम के पत्ते और नारियल रखे हों
- नैवेद्य: जौ या सत्तू, गुड़, फल, मिठाई और तुलसी दल
- दान की वस्तुएँ: मटके, पंखे, छाते, जौ, अनाज, वस्त्र या भोजन
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें (हो सके तो पवित्र नदी में, या नहाने के जल में गंगाजल की कुछ बूँदें मिलाकर) और स्वच्छ, हल्के रंग के वस्त्र पहनें।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी, आज अक्षय तृतीया पर हम आपकी पूजा करते हैं। हमें और हमारे परिवार को स्थायी समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और शुभ कर्म करने की शक्ति प्रदान करें।"
- बहुत से श्रद्धालु पूजा पूरी होने तक हल्का उपवास रखते हैं या केवल सात्विक भोजन करते हैं।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी
- अपने घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व कोना) या पूजा घर साफ़ करें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का चित्र स्वच्छ पीले या लाल कपड़े से ढकी चौकी पर रखें।
- जल से भरा कलश मूर्तियों के पास रखें और उस पर आम के पत्ते तथा नारियल स्थापित करें।
चरण 3: पूजन
- दीपक जलाना: देवताओं के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: चित्रों पर चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
- फूल और तुलसी अर्पित करना: भगवान विष्णु को ताज़े फूल और तुलसी दल चढ़ाएँ।
- नैवेद्य अर्पित करना: देवताओं के सामने जौ या सत्तू, गुड़, फल और मिठाई रखें।
चरण 4: कथा पाठ और जप
- दाएँ हाथ में चावल के कुछ दाने और फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- पूरे ध्यान और भक्ति के साथ अक्षय तृतीया की कथा पढ़ें या सुनें।
- सामर्थ्य के अनुसार भगवान विष्णु के नाम का जप करें या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, फिर दाने और पंखुड़ियाँ देवताओं के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और दान
- जलते हुए घी के दीपक से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें।
- ज़रूरतमंदों और ब्राह्मणों को दान दें, जैसे मटके, जौ, अनाज, वस्त्र या भोजन। गर्मी में जल और ठंडक देने वाली वस्तुओं का दान विशेष रूप से प्रिय माना जाता है।
- ओडिशा में परिवार चंदन यात्रा की परंपरा के अनुसार धान की बुवाई भी आरंभ करते हैं और प्रभु को चंदन का लेप अर्पित करते हैं।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और दिन का समापन
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर (चरण स्पर्श) उनका आशीर्वाद लें।
- प्रसाद परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटें।
- चाहें तो नए और शुभ कार्य आरंभ करें, या सोना और अन्य टिकाऊ वस्तुएँ खरीदें, और सादे सात्विक भोजन के साथ दिन का समापन करें।
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