जानकी नवमी 2027

शुक्रवार, 14 मई 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • सुहागिन स्त्रियाँ: सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु, कुशलता और सुखी पारिवारिक जीवन (सौभाग्य) के लिए यह व्रत रखती हैं और माता सीता की पूजा करती हैं।
  • श्री राम-सीता के भक्त: जो परिवार दिव्य दंपती के प्रति श्रद्धा रखते हैं, वे सद्गुण, धैर्य और घर में शांति की कामना से यह व्रत करते हैं।
  • अविवाहित कन्याएँ: कन्याएँ अच्छे और समर्पित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता सीता से प्रार्थना करती हैं।

पूजा का समय

  • प्रातः की तैयारी: व्रत शुरू करने से पहले ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और संकल्प कर लिया जाता है।
  • पूजा मुहूर्त: मुख्य पूजा मध्याह्न में की जाती है, क्योंकि माना जाता है कि माता सीता इसी समय प्रकट हुई थीं। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • दिन का समापन: शाम को आरती की जाती है और पूजा पूरी होने के बाद व्रत खोला जाता है (कुछ परिवारों में व्रत उसी शाम खोला जाता है और कुछ में अगली सुबह)।

पर्व के बारे में

सीता नवमी, जिसे जानकी नवमी भी कहते हैं, माता सीता के प्राकट्य का पावन पर्व है। यह पूरे भारत में, विशेष रूप से मिथिला और अयोध्या में, बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (माता सीता के जन्म की कथा)

बहुत समय पहले मिथिला राज्य में जनक नाम के एक ज्ञानी और धर्मात्मा राजा राज करते थे। वे महान शासक थे, फिर भी राजा और उनकी रानी के कोई संतान नहीं थी, और राज्य कठिन समय से गुज़र रहा था।

ऋषियों की सलाह पर राजा जनक एक पवित्र यज्ञ करने और यज्ञभूमि को अपने हाथों से हल चलाकर जोतने को तैयार हुए, ताकि धरती धन्य हो और उनके राज्य में समृद्धि लौट आए।

ऋषियों ने उनसे कहा: "हे राजन, जब आप शुद्ध हृदय और पूरी भक्ति से खेत जोतेंगे, तब माता पृथ्वी आपके राज्य और आपके परिवार को आशीर्वाद देंगी।" राजा जनक ने गहरी आस्था के साथ उनकी बात मानी और पवित्र खेत में हल चलाने लगे।

जब सोने का हल धरती को छूकर आगे बढ़ा, तो वह हल की रेखा (सीता) में पड़ी एक पेटिका से टकराया। उसके भीतर एक तेजस्वी नन्ही कन्या लेटी थी। राजा जनक और रानी सुनयना ने अत्यंत हर्ष से उसे धरती माता का उपहार मानकर अपनाया और उसका नाम सीता रखा, जिसका अर्थ है "हल की रेखा"। वही आगे चलकर जानकी बनीं, जो मिथिला की लाडली पुत्री और श्री राम की समर्पित पत्नी थीं। उसी दिन से भक्त माता सीता को पवित्रता, धैर्य और भक्ति का आदर्श मानकर उनके सम्मान में सीता नवमी मनाते हैं।


पूजा सामग्री

दोपहर की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / मूर्ति: श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी का चित्र या मूर्ति, और हो सके तो हनुमान जी का भी
  • तिलक और पावन चूर्ण: रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत
  • दीप और प्रकाश: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, तथा अगरबत्ती
  • पवित्र जल पात्र: ताज़े जल से भरा कलश या छोटा पात्र, आम के पत्तों सहित
  • नैवेद्य: खीर, हलवा, फल और पंचामृत
  • पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, तुलसी दल, कलावा, तथा माता सीता के लिए सिंदूर, चूड़ियाँ और लाल वस्त्र (सुहाग सामग्री)

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातः की तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो पीले, लाल या गुलाबी; काले वस्त्र न पहनें)।
  2. दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे जगज्जननी माता सीता, आज मैं अपने परिवार की कुशलता के लिए शुद्ध भक्ति से यह व्रत रख रही हूँ। मुझे धैर्य, सद्गुण और शांतिपूर्ण घर का आशीर्वाद दें।"
  3. दिन भर व्रत रखें; ज़रूरत हो तो केवल फल और जल लें (व्रत कितनी कठोरता से रखा जाए, इसमें परिवारों की परंपराएँ अलग-अलग हैं)।

चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी (पूर्वाह्न)

  1. घर के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) या पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
  2. एक चौकी पर साफ़ लाल या पीला वस्त्र बिछाएँ और उस पर श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के चित्र या मूर्तियाँ स्थापित करें।
  3. चौकी के पास जल से भरा कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें।

चरण 3: मध्याह्न की पूजा

  1. दीपक जलाना: दिव्य दंपती के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
  2. तिलक लगाना: श्री राम और माता सीता को रोली, कुमकुम और अक्षत से तिलक लगाएँ।
  3. फूल और तुलसी अर्पित करना: ताज़े फूल और तुलसी दल चढ़ाएँ, और कलश पर कलावा बाँधें।
  4. सुहाग सामग्री अर्पित करना: माता सीता को सिंदूर, चूड़ियाँ और लाल वस्त्र अर्पित करें, फिर खीर, हलवा और फलों का नैवेद्य देवताओं के सामने रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाहिने हाथ में थोड़े चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
  2. श्रद्धापूर्वक वेदी के सामने बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति से सीता नवमी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  3. कथा पूरी होने पर हाथ में रखे दाने देवताओं के चरणों के पास छिड़क दें।

चरण 5: आरती और प्रार्थना

  1. श्री राम की आरती के साथ जानकी आरती करें; घी के जलते दीपक से आरती उतारें और भजन गाएँ।
  2. शांत मन से सीता चालीसा का पाठ करें, या "श्री सीतायै नमः" तथा श्री राम और माता सीता के नामों का जाप करें।
  3. दिव्य दंपती को प्रणाम करें और अपने परिवार के सुख और सौहार्द की प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद (चरण स्पर्श) लें।
  2. प्रसाद परिवारजनों में बाँटें, और चाहें तो किसी सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री भेंट करें।
  3. प्रसाद ग्रहण कर और सादा सात्विक भोजन करके व्रत खोलें।

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