फलहारिणी काली पूजा 2027
शुक्रवार, 4 जून 2027
पूजा विधि
यह पूजा कौन करे?
- माँ काली के भक्त: जगज्जननी के उपासक माँ की रक्षा, साहस तथा भय और बाधाओं के नाश की कामना से इस रात्रि का व्रत करते हैं।
- साधक: शाक्त मार्ग के अनुयायी तथा श्री रामकृष्ण और सारदा देवी के भक्त भी आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक शुद्धि (साधना) के लिए इस रात्रि जागरण करते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकाल: सुबह जल्दी स्नान करके पूजा का संकल्प लें; व्रत रखने वाले दिन भर हल्का उपवास रखते हैं (उपवास कितना कठोर हो, यह परिवारों में अलग-अलग होता है)।
- सायं तैयारी: सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा की चौकी और भोग की तैयारी करें।
- पूजा मुहूर्त: मुख्य पूजा निशीथ काल (लगभग मध्यरात्रि) में होती है। अपने शहर का निशीथ काल इसी पृष्ठ पर देखें।
- पूजा का समापन: रात्रि में आरती और पुष्पांजलि के बाद प्रसाद बाँटा जाता है।
पर्व के बारे में
फलहारिणी काली पूजा बंगाल का अत्यंत प्रिय पर्व है, जिसमें गहरी रात में माँ काली की पूजा की जाती है। यह पर्व ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।
कथा (दक्षिणेश्वर की फलहारिणी काली पूजा की कथा)
बहुत समय पहले कोलकाता के पास दक्षिणेश्वर के मंदिर परिसर में महान संत श्री रामकृष्ण परमहंस रहते थे, जो माँ काली के परम भक्त थे। उनकी पत्नी सारदा देवी उनके पास रहने आई थीं, और वे उनमें साक्षात् जगन्माता का रूप देखते थे।
सन् 1872 की फलहारिणी काली पूजा की रात श्री रामकृष्ण ने अपनी सर्वोच्च उपासना अर्पित करने का मन बनाया। उन्होंने जगन्माता के सोलह वर्ष की आयु वाले स्वरूप, देवी षोडशी (त्रिपुरसुंदरी) की पूजा की तरह आयोजन किया और सारदा देवी को उनके स्थान पर आसन पर बैठाया।
सारदा देवी गहरी शांति में बैठी रहीं और श्री रामकृष्ण ने फूलों, भोग और मंत्रों से उनका पूजन किया। फिर उन्होंने अपनी सारी साधना का फल और अपनी जपमाला उनके चरणों में अर्पित कर दी और कहा: "हे मंगलमयी, सबका कल्याण करने वाली, सबकी शरण, आपको प्रणाम है। यह पूजा और मेरी सारी साधना का फल स्वीकार करें।" दोनों गहरी समाधि (ध्यान में लीनता) में चले गए, जो पूरी रात बनी रही।
उस दिन से यह अमावस्या फलहारिणी कहलाती है, यानी वह काली जो हमारे कर्मों के फल हर लेती हैं। भक्त इस रात माँ काली की कृपा और कर्मों के बोझ से मुक्ति पाने के लिए उनकी पूजा करते हैं।
पूजा सामग्री
मध्यरात्रि की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- प्रतिमा / चित्र: स्वच्छ लाल वस्त्र बिछी चौकी पर माँ काली की मूर्ति, चित्र या यंत्र
- तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम, सिंदूर और अक्षत
- दीपक और ज्योति: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी या सरसों का तेल, और धूप
- पवित्र जल पात्र: गंगाजल या स्वच्छ जल से भरा कलश, ऊपर आम के पत्ते और नारियल
- नैवेद्य: फल, मिठाई, खिचड़ी या भोग, और पायस (चावल की खीर)
- पूजा की अन्य सामग्री: लाल गुड़हल (जवा) के फूल, माला, बेल पत्र और कलावा
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातः तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो लाल या सफ़ेद)।
- दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे जगज्जननी माँ काली, आज हम पूरी भक्ति से आपका पूजन करते हैं। हमारे भय और बाधाएँ दूर करें, और हमें अपनी कृपा और शक्ति प्रदान करें।"
- दिन भर सरल उपवास रखें; परिवार की परंपरा में मान्य हो तो केवल फल और दूध लें।
चरण 2: पूजा की चौकी सजाना (सायंकाल)
- पूजा स्थान और कमरे के उत्तर या पूर्व भाग को स्वच्छ करें।
- माँ काली की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ लाल वस्त्र बिछी चौकी पर स्थापित करें।
- प्रतिमा के पास जल, आम के पत्तों और नारियल सहित कलश रखें।
चरण 3: रात्रि की पूजा-विधि
- दीपक जलाना: माँ काली के सामने दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: प्रतिमा और कलश पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
- पुष्प और सूत्र अर्पित करना: लाल गुड़हल के फूल, माला और बेल पत्र चढ़ाएँ, और कलश पर कलावा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: देवी के सामने फल, मिठाई और भोग रखें।
चरण 4: निशीथ काल (मध्यरात्रि) में मुख्य पूजा
- प्रतिमा के सामने बैठकर निशीथ काल (लगभग मध्यरात्रि) में मुख्य पूजा आरंभ करें।
- गहरे ध्यान के साथ अपने कुल की परंपरा का काली मंत्र जपें, या काली स्तोत्र अथवा काली चालीसा का पाठ करें।
- जगन्माता का ध्यान करें और अपने कर्म तथा उनके फल उनके चरणों में समर्पित कर दें।
चरण 5: आरती और पुष्पांजलि
- जलते दीपक से काली आरती करें और भक्ति गीत गाएँ।
- परिवार की रक्षा की प्रार्थना के साथ देवी को पुष्पांजलि (हाथों में फूल लेकर जुड़े हाथों से अर्पण) दें।
- देवी को प्रणाम करें और पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा माँगें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
- प्रसाद परिवारजनों और पड़ोसियों में बाँटें।
- प्रसाद ग्रहण करके और सादा सात्त्विक भोजन करके पूजा का समापन करें।
ज्ञान केंद्र में और पढ़ें
- अबूझ मुहूर्त 2026 और 2027: क्या हैं, और क्या फिर भी मुहूर्त निकलवाएँ?
- विद्यारंभ संस्कार 2026: तिथि, सही उम्र और घर पर पूरी विधि
- भारत के फसल त्योहार: संक्रांति, पोंगल, बैसाखी और ओणम कब और क्यों
आने वाले व्रत और त्योहार
सभी त्योहार देखें- शनि जयंतीशुक्रवार
- वट सावित्री व्रत18 जून 2027 तक
- जमाई षष्ठीगुरुवार
- ज्येष्ठ अष्टमीशुक्रवार
- गंगा दशहरारविवार
- निर्जला एकादशीसोमवार
- शनि जयंती: 4 जून 2027
- वट सावित्री व्रत: 4 जून 2027 – 18 जून 2027
- जमाई षष्ठी: 10 जून 2027
- ज्येष्ठ अष्टमी: 11 जून 2027
- गंगा दशहरा: 13 जून 2027
- निर्जला एकादशी: 14 जून 2027