छेरछेरा 2027

शुक्रवार, 22 जनवरी 2027

पूजा विधि


यह पर्व कौन मनाता है?

  • किसान परिवार: छत्तीसगढ़ के किसान और गृहस्थ नई फ़सल के लिए आभार प्रकट करते हैं और आने वाले वर्ष में अन्न की भरपूर उपज (धन समृद्धि) की प्रार्थना करते हैं।
  • बच्चे और युवा: बच्चों और युवाओं की टोलियाँ घर-घर जाकर अन्न माँगती हैं, और इस तरह देने-लेने की परंपरा को जीवित रखती हैं।
  • गृहस्थ: हर परिवार अन्न और भोजन के साथ आने वालों का सत्कार करता है और अन्न व समृद्धि की देवी का आशीर्वाद चाहता है।

पूजा का समय

  • प्रातः स्नान और पूजा: ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय के समय जल्दी स्नान करें, और सुबह देवी तथा नए अन्न की पहली पूजा करें।
  • घर-घर जाना: सुबह की पूजा के बाद बच्चे और युवा सुबह से दिन भर घर-घर जाते हैं। अपने गाँव या कस्बे की स्थानीय परंपरा देखें (कुछ जगहों पर यह शाम तक चलता है)।
  • सामूहिक भोजन: परिवार दोपहर में त्योहार का भोजन बनाते और मिलकर खाते हैं, और दिन का समापन अक्सर गीतों तथा लोकनृत्य (डंडा नाच सहित) के साथ होता है।

पर्व के बारे में

छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक बहुत प्रिय फ़सल पर्व है, जिसमें लोग खुशी और आभार के साथ नया अन्न देते और लेते हैं। यह पर्व पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।


कथा (छेरछेरा की कथा)

छेरछेरा पौष की ठंडी सर्दियों में मनाया जाता है, जब साल भर का धान कट चुका होता है, मिंज चुका होता है और कोठी में भर चुका होता है। छत्तीसगढ़ के खेतिहर गाँवों में यह भरपूर उपज का मौसम है, और यह पर्व धरती तथा अन्न की देवी को फ़सल के लिए धन्यवाद देने का एक तरीक़ा है।

पौष पूर्णिमा को देवी शाकंभरी का दिन भी माना जाता है, जो जगत जननी का वह रूप हैं जो सब जीवों को साग-सब्ज़ी और अन्न से पालती हैं, और अन्न की देवी अन्नपूर्णा का पावन दिन भी। कई परिवार कहते हैं कि इसी दिन भगवान शिव भिक्षुक बनकर अन्नपूर्णा के द्वार पर आए थे और भिक्षा पाई थी, इसीलिए इस दिन अन्न का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

पर्व की सुबह बच्चों और युवाओं की टोलियाँ बोरे और टोकरियाँ लेकर घर-घर जाती हैं और पुकारती हैं "छेरछेरा, कोठी के धान ला हेर हेरा" (अपनी कोठी का धान निकालकर दो)। घर के लोग उन्हें नए अन्न का एक हिस्सा देते हैं, और बड़े-बुज़ुर्ग कहते हैं कि जो खुले मन से देता है, उसकी कोठी कभी ख़ाली नहीं होती। गाँवों में यह देना-लेना गीत और लोकनृत्य के साथ मनाया जाता है।

बहुत पहले से छत्तीसगढ़ के लोग छेरछेरा इसी तरह मनाते आए हैं, ऐसे दिन के रूप में जब देने वाले और माँगने वाले में कोई भेद नहीं रहता और फ़सल सबके साथ बँटती है। यह कृतज्ञता, उदारता और सामूहिकता का पर्व है, जब हर घर खुशी से अपना द्वार और अपनी कोठी खोल देता है।


पूजा सामग्री

सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / मूर्ति: माता अन्नपूर्णा या शाकंभरी का चित्र या मूर्ति, या देवी के आसन के रूप में रखा नए अन्न का छोटा ढेर
  • तिलक व पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम और अक्षत
  • दीप व प्रकाश: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी, रुई की बाती और अगरबत्ती
  • फ़सल का अन्न: नया धान, चावल और दालें, जो द्वार पर आने वालों को देने के लिए अलग रखी जाएँ
  • नैवेद्य: ताज़ा पका चावल, खीर, पूरी और नई फ़सल की मौसमी सब्ज़ियाँ
  • पूजा के अन्य सामान: फूल, कलावा और वेदी के लिए स्वच्छ वस्त्र

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकाल की तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र (हो सके तो पीले, लाल या नए उत्सवी वस्त्र) पहनें।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लें और संकल्प लें: "हे जगत जननी माँ अन्नपूर्णा, आज हम इस फ़सल के लिए आपका आभार प्रकट करते हैं। हमारे घर को धन-धान्य से भर दें, और हमें खुशी से देने वाला उदार हृदय प्रदान करें।"
  3. आँगन और घर की सफ़ाई करें, और आने वालों को देने के लिए नया अन्न अलग रख लें।

चरण 2: पूजा की वेदी सजाना (प्रातःकाल)

  1. ईशान कोण या कोठी अथवा रसोई के पास कोई स्वच्छ स्थान साफ़ करें।
  2. लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएँ और उस पर देवी का चित्र रखें।
  3. चित्र के सामने नए धान या चावल का छोटा ढेर और स्वच्छ जल का पात्र रखें।

चरण 3: प्रातःकालीन पूजन करना

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर देवी के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: चित्र और नए अन्न के ढेर पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और अन्न के पात्र पर कलावा (लाल धागा) बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: ताज़ा पका चावल, खीर और अन्य पकवान देवी के सामने रखें।

चरण 4: फ़सल के लिए आभार प्रकट करना

  1. दाएँ हाथ में नए धान के कुछ दाने और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
  2. वेदी के सामने श्रद्धा से बैठें और पूरे ध्यान तथा भक्ति से छेरछेरा की कथा याद करें या सुनें।
  3. कथा पूरी होने पर दाने देवी के चरणों में अर्पित करें और फ़सल के लिए कृतज्ञता से प्रणाम करें।

चरण 5: आने वालों को अन्न देना

  1. नया अन्न द्वार पर तैयार रखें, और गाते-पुकारते आए बच्चों और युवाओं का छेरछेरा के लिए स्वागत करें।
  2. हर टोली को प्रेम से अभिवादन करते हुए धान दान (अन्न का दान) दें, साथ में मिठाई या भोजन का एक हिस्सा भी दें।
  3. गाँव के गीतों और नृत्य में शामिल हों, और दिन की खुशी पड़ोसियों के साथ बाँटें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना

  1. परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें।
  2. नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों और बच्चों में बाँटें।
  3. नई फ़सल से बना त्योहार का भोजन साथ बैठकर खाएँ, और देवी को धन्यवाद देते हुए दिन का समापन करें।

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