चित्रगुप्त पूजा 2026
बुधवार, 11 नवंबर 2026
पूजा विधि
यह पूजा कौन करे?
- कायस्थ परिवार: कायस्थ परिवार यह पूजा अपने घर में करते हैं। वे अपनी आजीविका के साधन कलम और दवात का पूजन करते हैं और वर्ष भर की आय और व्यय का ब्योरा भगवान चित्रगुप्त के सामने रखते हैं।
- लेखक, विद्यार्थी और पेशेवर लोग: जिनकी जीविका कलम से चलती है, वे भी इस दिन कलम की पूजा करते हैं और वाणी तथा विद्या का वरदान माँगते हैं।
- बिहार के परिवार: बिहार के चित्रांश कायस्थ परिवार भी यही घरेलू पूजा करते हैं, उसी कागज़ और उसी मंत्र के साथ।
पूजा का समय
- कलम को विश्राम: दीपावली की पूजा की रात से कलम और दवात पूजा के स्थान पर रख दी जाती हैं और उनका उपयोग नहीं किया जाता। कारण यह बताया जाता है कि श्री राम के राजतिलक के समय निमंत्रण में चित्रगुप्त जी को भुला दिया गया था, तब उन्होंने अपनी कलम एक ओर रख दी थी। श्री राम अयोध्या में उनके मंदिर गए और क्षमा माँगी, तभी चित्रगुप्त जी ने कलम फिर उठाई।
- पूजा मुहूर्त: चित्रगुप्त पूजा अपराह्न (दोपहर बाद के समय) में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- पूजा के बाद: पूजा संपन्न होने पर कलम फिर उठाई जाती है और लिखने का काम दोबारा शुरू होता है।
पर्व के बारे में
चित्रगुप्त पूजा, जिसे कलम-दवात पूजा भी कहते हैं, उत्तर भारत का एक अत्यंत प्रिय पर्व है, जिसमें कायस्थ परिवार प्राणियों के पुण्य और पाप का लेखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, यानी भाई दूज के ही दिन।
कथा (राजा सौदास की कथा)
बहुत समय पहले की बात है, सौराष्ट्र देश में सौदास नाम का एक राजा रहता था। वह बड़ा पापी था, दूसरों का धन हड़प लेता था और उसने जीवन भर कोई धर्म का काम नहीं किया था। एक दिन जंगल में शिकार खेलते समय उसने एक ब्राह्मण को व्रत रखकर चित्रगुप्त और यमराज की पूजा करते देखा। उस दिन यम द्वितीया थी।
राजा ने ब्राह्मण से पूछा कि वे क्या कर रहे हैं, तो ब्राह्मण ने उसे यम द्वितीया के व्रत के बारे में बताया। राजा ने उसी समय धूप और दीप से चित्रगुप्त के साथ धर्मराज का पूजन किया। कुछ समय बाद वह यह व्रत भूल गया, पर याद आने पर उसने उसे फिर किया।
राजा की मृत्यु होने पर यमदूतों ने उसे बाँधा और घसीटकर यमराज के सामने ले गए। यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा कि इस राजा ने जीवन में क्या किया है। चित्रगुप्त ने उत्तर दिया: "इसने बहुत बुरे कर्म किए हैं, पर एक बार इसने यम द्वितीया का व्रत किया था। चंदन और फूलों से हमारा पूजन किया था, उस दिन एक ही बार भोजन किया था और रात भर जागरण किया था। इसलिए इसे नरक में नहीं भेजा जा सकता।"
यह सुनकर धर्मराज ने राजा को मुक्त कर दिया, और उस व्रत के प्रभाव से वह परम गति को प्राप्त हुआ। तभी से माना जाता है कि इस दिन चित्रगुप्त की पूजा नरक से मुक्ति और अकाल मृत्यु से रक्षा देती है।
पूजा सामग्री
दोपहर की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र और आसन: चित्रगुप्त जी का चित्र या मूर्ति (यमराज के साथ), लाल कपड़ा बिछी हुई चौकी और कलश
- कलम, दवात और कागज़: कलम, दवात, सादा कागज़, बहीखाता, तलवार और मौली (कलावा)
- तिलक और पूजन सामग्री: चंदन, हल्दी, रोली, अक्षत, लाल फूल और दूब
- दीपक और सुगंध: घी का दीपक, धूप, कपूर और गंगाजल
- नैवेद्य: दही, गुड़, पाँच फल, पाँच मिठाइयाँ, पाँच मेवे, लाई, चूड़ा, धान का लावा, पंचामृत, पान और सुपारी
- हवन सामग्री: हवन सामग्री और हवन की लकड़ी
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: वेदी की तैयारी (प्रातःकाल)
- सुबह स्नान करें और चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ।
- चौकी पर चित्रगुप्त जी का चित्र रखें और कलश की स्थापना (कलश स्थापना) करें।
- चित्र के सामने दवात, कलम, कागज़, बहीखाता और तलवार रखें।
चरण 2: चित्रगुप्त जी का आवाहन और पूजन (अपराह्न)
- आवाहन: जल छिड़कें और ध्यान तथा आवाहन मंत्रों से चित्रगुप्त जी का आवाहन करें, यह कहते हुए: "ॐ भगवन्तं श्री चित्रगुप्त आवाहयामि स्थापयामि।"
- स्नान कराना: पहले चित्र को जल और पंचामृत से स्नान कराएँ।
- तिलक और फूल चढ़ाना: चित्रगुप्त जी को चंदन, हल्दी, रोली, अक्षत, फूल और धूप अर्पित करें।
- भोग लगाना: फल, पंचामृत, पान-सुपारी, खीर और मिठाई का भोग लगाएँ।
चरण 3: कलम और दवात का पूजन
- कलम और दवात पर मौली बाँधें।
- कलम और दवात को रोली और अक्षत चढ़ाएँ।
- एक कागज़ लें। परिवार का हर सदस्य उस पर दही और रोली से स्वस्तिक बनाए।
- स्वस्तिक के नीचे पाँच नाम लिखें: "श्री गणेशाय नमः, श्री चित्रगुप्ताय नमः, श्री शिवाय नमः, श्री सरस्वत्यै नमः, श्रीं महालक्ष्म्यै नमः" (कुछ परिवार इसके बदले "श्री गणेशाय नमः" और "ॐ चित्रगुप्ताय नमः" ग्यारह बार लिखते हैं)।
चरण 4: वर्ष का लेखा और मंत्र
- कागज़ के एक ओर अपना नाम, पता और तिथि लिखें।
- दूसरी ओर वर्ष भर की आय और व्यय का ब्योरा लिखें, आने वाले वर्ष में धन की प्रार्थना लिखें और हस्ताक्षर करें।
- कागज़ और कलम को दही, हल्दी, रोली, अक्षत और मिठाई अर्पित करें, और कम से कम ग्यारह बार यह मंत्र बोलें: "मसीभाजनसंयुक्तश्चरसि त्वं महीतले। लेखनीकटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोऽस्तु ते॥"
- कागज़ को मोड़कर चित्रगुप्त जी के सामने रख दें।
चरण 5: कथा का पाठ और हवन
- हाथ में एक फूल लेकर वेदी के सामने श्रद्धा से बैठें।
- पूरे ध्यान और भक्ति से चित्रगुप्त व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और अंत में फूल चढ़ा दें।
- हवन करें और "ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः स्वाहा" कहकर आहुतियाँ दें।
चरण 6: आरती, प्रसाद और लिखना फिर शुरू करना
- जलते घी के दीपक से चित्रगुप्त जी की आरती करें और गाएँ "ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे" (आरती "श्री विरंचि कुलभूषण" और स्तुति "जय चित्रगुप्त यमेश तव" भी गाई जाती हैं)।
- प्रसाद परिवार में बाँटें।
- कलम फिर उठाएँ और लिखना शुरू करें। व्यापारी नए बहीखाते के पहले पन्ने पर स्वस्तिक या "श्री" और "श्री गणेशाय नमः" लिखकर उसे शुरू करते हैं।
- पूजा के बाद बिहार के कई परिवार दान देते हैं।
ज्ञान केंद्र में और पढ़ें
- अबूझ मुहूर्त 2026 और 2027: क्या हैं, और क्या फिर भी मुहूर्त निकलवाएँ?
- विद्यारंभ संस्कार 2026: तिथि, सही उम्र और घर पर पूरी विधि
- भारत के फसल त्योहार: संक्रांति, पोंगल, बैसाखी और ओणम कब और क्यों
आने वाले व्रत और त्योहार
सभी त्योहार देखें- छठ पूजा16 नवंबर 2026 तक
- नागुल चवितिशुक्रवार
- लाभ पंचमीशनिवार
- सूरसंहारम्रविवार
- जलाराम जयंतीसोमवार
- गोपाष्टमीमंगलवार
- छठ पूजा: 13 नवंबर 2026 – 16 नवंबर 2026
- नागुल चविति: 13 नवंबर 2026
- लाभ पंचमी: 14 नवंबर 2026
- सूरसंहारम्: 15 नवंबर 2026
- जलाराम जयंती: 16 नवंबर 2026
- गोपाष्टमी: 17 नवंबर 2026