गौरी व्रत 2027
बुधवार, 14 जुलाई 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- अविवाहित कन्याएँ: कन्याएँ माता गौरी (पार्वती) से योग्य और समर्पित पति (योग्य वर प्राप्ति) का आशीर्वाद पाने के लिए यह पाँच दिन का व्रत करती हैं।
- आशीर्वाद चाहने वाली महिलाएँ: कुछ महिलाएँ भी परिवार के सुख और कुशलता की प्रार्थना करते हुए इस व्रत में सम्मिलित होती हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में स्नान करें और दिन की पूजा की तैयारी करें।
- दैनिक पूजा: गौरी पूजा सुबह की जाती है और व्रत पूरा होने तक रोज़ की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- दिन का भोजन: दिन में केवल एक बार, पूजा के बाद, बिना नमक का भोजन (मोळो) किया जाता है। (व्रत कितनी कठोरता से रखा जाए, यह परिवारों में अलग-अलग होता है।)
पर्व के बारे में
गौरी व्रत, जिसे मोळाकत या मोळा व्रत भी कहते हैं, गुजरात का एक प्रिय पर्व है, जिसमें कन्याएँ पाँच दिन उपवास रखकर माता गौरी की पूजा करती हैं। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलता है।
व्रत कथा (माता पार्वती की कथा)
बहुत समय पहले हिमालय की पुत्री माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव की भक्त थीं। वे उन्हें अपना पति बनाना चाहती थीं और उनका हृदय जीतने के लिए उन्होंने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
उनकी भक्ति के बाद भी शिव गहरी तपस्या में लीन रहे और पार्वती की राह आसान नहीं थी। वे जानती थीं कि सच्चा प्रयास और संयम ही उनकी इच्छा पूरी कर सकते हैं। उन्होंने देवर्षि नारद से मार्गदर्शन माँगा, जिन्होंने उन्हें सलाह दी: "कठोर व्रत रखो, सादा जीवन जियो और शुद्ध मन से पूजा करो। श्रद्धा के साथ डटी रहो, तुम्हारी भक्ति का फल अवश्य मिलेगा।"
पार्वती ने उनकी सलाह को पूरे मन से माना। उन्होंने सुख-सुविधाएँ छोड़ दीं, सादा भोजन किया और अटूट श्रद्धा से शिव की आराधना की। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया, और उनके विवाह का उत्सव तीनों लोकों में मनाया गया। तभी से गुजरात की कन्याएँ गौरी व्रत करती हैं और माता गौरी से योग्य वर तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।
पूजा सामग्री
पहले दिन की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- मूर्ति / चित्र: माता गौरी (पार्वती) की मूर्ति या चित्र, और हो सके तो भगवान शिव का भी
- अंकुरित अनाज (जवारे): छोटे गमले या टोकरी में बोए गए गेहूँ या ज्वार के दाने (जवारे), जो पाँच दिनों में उगते हैं
- तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और ज्योति: घी और रुई की बाती वाला पीतल या मिट्टी का दीपक
- फूल और पत्ते: ताज़े फूल, दूर्वा और बेलपत्र
- नैवेद्य: फल, हलवे जैसी मिठाइयाँ, और बिना नमक का भोजन (मोळो), जैसे उबला गेहूँ, दूध और गुड़
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
- दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे माता गौरी, मैं शुद्ध भक्ति से यह पाँच दिन का व्रत आरंभ करती हूँ। मुझे योग्य पति और सुखी घर का आशीर्वाद दें।"
- पाँचों दिन उपवास रखें और दिन में केवल एक बार बिना नमक का भोजन करें।
चरण 2: पूजा की चौकी तैयार करना
- घर का ईशान कोण या कोई शांत स्थान साफ़ करें।
- माता गौरी की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ लाल कपड़े से ढकी लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें।
- अनाज को छोटे गमले या टोकरी में बोएँ, हल्का पानी छिड़कें और माता के पास रखें।
चरण 3: दैनिक पूजन करना
- दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर माता गौरी के सामने रखें।
- तिलक लगाना: माता गौरी के चित्र को रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
- फूल अर्पित करना: ताज़े फूल, दूर्वा और बेलपत्र चढ़ाएँ।
- नैवेद्य अर्पण: माता के सामने फल, मिठाइयाँ और बिना नमक का भोजन रखें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाहिने हाथ में थोड़े चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- चौकी के सामने श्रद्धा से बैठकर पूरे ध्यान और भक्ति के साथ गौरी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा पूरी होने पर दाने और पंखुड़ियाँ माता के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और जवारों की रोज़ देखभाल
- जलते हुए घी के दीपक से भक्ति गीत गाते हुए गौरी आरती करें।
- रोज़ अंकुरित अनाज को पानी दें और पाँचों दिन उसकी देखभाल करें।
- व्रत पूर्णिमा को पूरा होने तक यही पूजा रोज़ दोहराएँ।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और भोजन करना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
- माता को नैवेद्य अर्पित करें और कुछ प्रसाद परिवार में बाँटें।
- दिन में एक बार सादा, बिना नमक का भोजन करें।
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