गुरु पूर्णिमा 2027
रविवार, 18 जुलाई 2027
पूजा विधि
यह पूजा कौन करे?
- शिष्य और विद्यार्थी: जो लोग किसी आध्यात्मिक गुरु या शिक्षक का अनुसरण करते हैं, वे इस दिन उनका सम्मान करते हैं और उनका मार्गदर्शन तथा आशीर्वाद माँगते हैं।
- परिवार: माता-पिता और बच्चे अपने बड़ों और गुरुजनों को याद करते हैं और मिले हुए ज्ञान के लिए उन्हें आदर (गुरु दक्षिणा) अर्पित करते हैं।
- महर्षि व्यास के भक्त: शास्त्रों के साधक और विद्वान महर्षि व्यास की पूजा करते हैं, जिन्होंने वेदों और महाभारत का संकलन किया।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: स्नान और संकल्प सुबह जल्दी, ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) से किया जाता है। कई भक्त नदी में पवित्र स्नान भी करते हैं।
- गुरु पूजा: गुरु और महर्षि व्यास की पूजा सूर्योदय के बाद सुबह की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- गुरु के दर्शन: शिष्य दिन में अपने गुरु या शिक्षक के पास जाकर उन्हें प्रणाम करते हैं।
- संध्या: अक्सर सत्संग, भजन या सत्यनारायण कथा होती है (परिवारों में रीति अलग-अलग है), और दिन का समापन दीपक जलाकर होता है।
पर्व के बारे में
गुरु पूर्णिमा पूरे भारत में मनाया जाने वाला अत्यंत पूजनीय पर्व है, जिस दिन शिष्य अपने गुरु और महर्षि व्यास की पूजा करते हैं, जिन्हें वेदों के प्रथम आचार्य के रूप में सम्मान दिया जाता है। यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
कथा (महर्षि व्यास की कथा)
बहुत समय पहले महर्षि पराशर की भेंट यमुना के तट पर एक मछुआरे की पुत्री सत्यवती से हुई। नदी के एक द्वीप पर उनके यहाँ श्याम वर्ण के एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम कृष्ण द्वैपायन रखा गया, क्योंकि वह द्वीप पर जन्मा था। वह बहुत शीघ्र बड़ा हो गया, ज्ञानी और तेजस्वी।
जन्म के कुछ ही समय बाद बालक ने माता से कहा कि वह वन जाकर तपस्या करना चाहता है, ताकि ज्ञान प्राप्त कर संसार की सेवा कर सके। सत्यवती उदास हुईं, पर उन्होंने अनुमति दे दी। व्यास ने उन्हें ढाढ़स बँधाते हुए कहा: "माँ, शांति से जाइए। जब भी आप मुझे याद करेंगी और मेरी आवश्यकता होगी, मैं आपके सामने प्रकट हो जाऊँगा।" फिर वे ध्यान करने वन चले गए।
अपनी तपस्या से उन्होंने एक वेद को चार भागों में बाँटा (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद), महाभारत और पुराणों की रचना की और उन्हें अपने शिष्यों को सिखाया। इसीलिए उन्हें वेद व्यास कहा जाता है। उस दिन से शिष्य आषाढ़ पूर्णिमा को अपने गुरुओं की पूजा करते हैं और व्यास जी को प्रथम महान गुरु के रूप में याद करते हैं, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / आसन: अपने गुरु और महर्षि व्यास का चित्र, या गुरु की चरण-पादुकाओं के लिए स्वच्छ आसन
- तिलक की सामग्री: रोली, कुमकुम, चंदन और अक्षत
- दीप और रोशनी: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, तथा अगरबत्ती
- पवित्र जल का पात्र: ताज़े जल से भरा छोटा कलश या पात्र, जिसमें गंगाजल मिला हो
- भोग (नैवेद्य): फल, खीर या हलवा जैसी मिठाइयाँ, और पंचामृत
- पूजा की अन्य सामग्री: ताज़े फूल, माला, कलावा, सफ़ेद या पीला वस्त्र, और दक्षिणा (गुरु के लिए भेंट)
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, सफ़ेद या पीले वस्त्र पहनें।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे गुरुदेव, आज हम कृतज्ञता से आपके चरणों में नमन करते हैं। हमें ज्ञान, सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलाइए।"
- दिन को सादा और सात्त्विक रखें। कई भक्त पूजा पूरी होने तक उपवास रखते हैं।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी
- अपने कमरे के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व दिशा की दीवार को साफ़ करें।
- अपने गुरु या महर्षि व्यास का चित्र स्वच्छ सफ़ेद या पीले वस्त्र से ढकी लकड़ी की चौकी पर रखें।
- जल से भरा कलश चित्र के पास रखें और सारी सामग्री तैयार रखें।
चरण 3: गुरु पूजा करना
- दीपक जलाना: अपने गुरु के चित्र के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
- तिलक लगाना: चित्र को, और यदि गुरु उपस्थित हों तो उन्हें भी, चंदन, रोली और अक्षत का तिलक लगाएँ।
- फूल और माला अर्पित करना: ताज़े फूल और माला चढ़ाएँ, और कलावे का एक टुकड़ा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: गुरु के सामने फल, मिठाइयाँ और पंचामृत रखें।
चरण 4: व्यास जी का स्मरण और मंत्र पाठ
- दाएँ हाथ में कुछ अक्षत और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
- श्रद्धापूर्वक बैठकर गुरु स्तोत्र या यह श्लोक पढ़ें: "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः", या पूरे मन और श्रद्धा से व्यास जी की कथा सुनें।
- पाठ पूरा होने पर अक्षत और पंखुड़ियाँ गुरु के चरणों में या चित्र के सामने अर्पित करें।
चरण 5: आरती और गुरु दक्षिणा
- जलते घी के दीपक से गुरु आरती करें और भजन गाएँ।
- यदि आपके गुरु उपस्थित हों, तो झुककर उनके चरण छुएँ और वस्त्र तथा फलों के साथ दक्षिणा अर्पित करें।
- यदि गुरु पास में न हों, तो चित्र के सामने प्रणाम करें और उनकी शिक्षाओं का कोई अंश पढ़ें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों और गुरुजनों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
- प्रसाद परिवार के सदस्यों और गुरुभाइयों-गुरुबहनों में बाँटें।
- प्रसाद ग्रहण करके और सादा सात्त्विक भोजन करके उपवास खोलें।
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