इगास बग्वाल 2026
शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
पूजा विधि: गढ़वाल (इगास)
यह पर्व कौन मनाता है?
- पशुपालक परिवार: गढ़वाल की पहाड़ियों में परिवार इस पर्व को घर पर मनाते हैं और अपने पशुधन की पूजा पिंड, हल्दी और माला से करते हैं।
- पूरा गाँव: रात को पूरा गाँव बर्त (रस्सी खींचने) और भैलो (जलते लकड़ी के गट्ठर) के लिए एकत्र होता है और मिलकर भैलो के पुराने गीत गाता है।
पूजा का समय
- पशुधन की पूजा: पशुधन की पूजा सुबह की जाती है और दोपहर तक चलती है। अपने शहर की तिथि का समय इसी पृष्ठ पर देखें।
- रात के अनुष्ठान: स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा, बर्त और भैलो रात को किए जाते हैं, जब पूरा गाँव एक साथ जुटता है।
पर्व के बारे में
इगास बग्वाल उत्तराखंड के गढ़वाल की पहाड़ियों का एक अत्यंत प्रिय पर्व है, जिसमें परिवार दिन में अपने पशुधन की पूजा करते हैं और गाँव रात को भैलो जलाता है। गढ़वाली में इगास का अर्थ एकादशी है और बग्वाल का अर्थ दिवाली। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को, दिवाली के ग्यारह दिन बाद मनाया जाता है।
कथा (माधो सिंह भंडारी की कथा)
बहुत समय पहले गढ़वाल के एक वीर भड़ (वीर योद्धा) माधो सिंह भंडारी टिहरी के राजा महीपति शाह की सेना के सेनापति थे। राजा ने उन्हें सेना के साथ तिब्बत से युद्ध करने के लिए भेजा।
सेना के दूर रहते बग्वाल (दिवाली) का समय आ गया, और पर्व तक एक भी सैनिक लौटकर नहीं आया। सबने मान लिया कि माधो सिंह और उनके साथी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए हैं, इसलिए उस वर्ष गढ़वाल में किसी ने बग्वाल नहीं मनाई। एक लोकगीत आज भी उनकी माँ को याद करता है, जो पर्व पर पर्व बीतते देखती रही और उसका माधो घर नहीं लौटा।
फिर दिवाली के ठीक ग्यारहवें दिन माधो सिंह भंडारी अपने सैनिकों के साथ तिब्बत का दापाघाट का युद्ध जीतकर मलेथा में अपने घर लौट आए।
उस खुशी में लोगों ने दीप जलाए और उसी दिन अपनी दिवाली मनाई। तभी से गढ़वाल में यह पर्व इगास बग्वाल के रूप में मनाया जाता है।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- पशुधन के लिए पके अन्न का पिंड: भात या झंगोरा, या जौ, या बाड़ी और मंडुवा, जैसा आपके घर में बनता हो, और फूलों से सजी परात
- पूजा और सजावट: पशुओं के पैर धोने के लिए जल, दीपक, धूप, हल्दी, सींगों के लिए सरसों का तेल, और हर पशु के लिए माला
- ग्वाल ढिंडी और धागा: हलवा, पूड़ी और पकौड़ी रखा एक पत्ता, और कलाई का रक्षाबंधन का धागा
- पर्व के व्यंजन: उड़द दाल के स्वाले और पकौड़ी
- भैलो के लिए: चीड़, तिल, भंगजीरा और हिसर की सूखी लकड़ी, और उसे बाँधने की रस्सी
- बर्त के लिए: घास की मोटी रस्सी
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: पशुधन की पूजा (सुबह से दोपहर तक)
- भात या झंगोरे से पिंड (पशुओं के लिए पका अन्न) बनाएँ; कुछ घरों में जौ, या बाड़ी और मंडुवा का भी उपयोग होता है। उसे फूलों से सजी परात में रखें।
- पशुओं के पैर धोएँ, दीपक और धूप जलाएँ और उनकी पूजा करें।
- माथे पर हल्दी का टीका लगाएँ, सींगों पर सरसों का तेल लगाएँ और गले में माला पहनाएँ।
- परात में रखा पिंड पशुओं को खिलाएँ।
चरण 2: ग्वाल ढिंडी और धागा
- हलवा, पूड़ी और पकौड़ी रखा पत्ता पिंड के साथ गौशाला ले जाएँ। यह ग्वाल ढिंडी है, जो पशुओं के खा लेने के बाद पशुओं की देखभाल करने वाले बच्चे को दी जाती है।
- कुछ घरों में कलाई का रक्षाबंधन का धागा उतारकर गाय की पूँछ पर, या मनोकामना के साथ बछड़े की पूँछ पर बाँधा जाता है।
चरण 3: पर्व के व्यंजन
- अपने घर में उड़द दाल के स्वाले और पकौड़ी बनाएँ।
- यदि किसी परिवार में शोक हो, तो वह उस वर्ष बग्वाल नहीं मनाता, इसलिए उसके यहाँ स्वाले और पकौड़ी भेजें।
चरण 4: भैलो तैयार करना और उसका पूजन (रात को)
- चीड़, तिल, भंगजीरा और हिसर की सूखी लकड़ी इकट्ठी करें और उसे रस्सी से बाँधकर भैलो बनाएँ।
- रात को अपने क्षेत्र के स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करें।
- पूजा के बाद भैलो का तिलक करें।
चरण 5: बर्त और भैलो
- गाँव वालों के साथ मिलकर बर्त खींचें, जो घास की मोटी रस्सी होती है।
- भैलो जलाएँ और भैलो के गीत गाएँ, जैसे "भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू" (उजाला आएगा, और अंधेरा भागेगा)।
पूजा विधि: कुमाऊँ (बूढ़ी दिवाली)
यह पर्व कौन मनाता है?
- घर की महिलाएँ: घर की महिलाएँ मुख्य भूमिका निभाती हैं। वे सूप पर आकृतियाँ बनाती हैं और दरिद्रता, दुःख व रोग के प्रतीक भुइयां को घर से बाहर निकालकर लक्ष्मी-नारायण को घर में बुलाती हैं।
- एकादशी का व्रत रखने वाली महिलाएँ: घर की महिलाएँ एकादशी का उपवास भी रखती हैं और इस दिन चावल नहीं खातीं।
पूजा का समय
- भुइयां को निकालना: सूप की यह रस्म पर्व के दिन की जाती है (घरों में समय अलग-अलग होता है)। अपने शहर की तिथि इसी पृष्ठ पर देखें।
- पाँच कन्याओं को भोजन: पहले पाँच कन्याओं को भोजन कराया जाता है, उसके बाद परिवार भोजन करता है।
- संध्या के दीपक: शाम को देहरी पर, ओखल के पास और तुलसी के पास दीपक जलाए जाते हैं।
पर्व के बारे में
बूढ़ी दिवाली उत्तराखंड के कुमाऊँ का एक अत्यंत प्रिय घरेलू पर्व है, जिसमें घर की महिलाएँ रंगे हुए सूप से भुइयां को बाहर निकालती हैं और लक्ष्मी-नारायण को घर में बुलाती हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। कुमाऊँ में लक्ष्मी की तीन अवस्थाओं के लिए तीन दिवाली मानी जाती हैं, और यह अंतिम दिवाली लक्ष्मी के वृद्ध स्वरूप की दिवाली है।
पूजा सामग्री
पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- सूप और रंग: सूप, उसे लीपने के लिए गेरू, और उँगलियों से आकृतियाँ बनाने के लिए बिस्वार (गीले पिसे चावल का घोल)
- ऐपण: द्वार, देहरी और तुलसी के गमले के लिए ऐपण के रंग
- रस्म के लिए: खील, अखरोट, अनार (दाड़िम), और गन्ने की डंडी (रिखू)
- दीपक: ओखल के लिए एक दीपक और तुलसी के लिए एक दीपक
- पाँच कन्याओं के भोजन के लिए: पूड़ी, बड़े और मिठाई
- व्रत का भोजन (कुमाऊँ के बहुत से घरों में): उगल का आटा, दूध या पानी, घी, आलू के टुकड़े और सेंधा नमक
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: सूप पर आकृतियाँ बनाना
- द्वार, देहरी और तुलसी के गमले पर ऐपण (कुमाऊँ की पारंपरिक पूजा-आकृतियाँ) दें।
- सूप को गेरू से लीप लें।
- बिस्वार से उँगलियों की सहायता से सूप के आगे के भाग में लक्ष्मी-नारायण बनाएँ।
- पीछे के भाग में भुइयां (जिसे घुइयां या अलक्ष्मी भी कहते हैं) बनाएँ, जिसके चार पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं और मुँह नहीं होता (ब्राह्मण परिवारों में हाथ में झाड़ू लिए पुरुष की आकृति बनाई जाती है)।
चरण 2: एकादशी का व्रत रखना
- घर की महिलाएँ एकादशी का उपवास रखती हैं। व्रत और तुलसी विवाह की जानकारी के लिए देवउठनी एकादशी का पृष्ठ देखें।
- इस दिन चावल (भात) नहीं खाया जाता, और व्रत रखने वाले अधिकतर फल खाते हैं।
- कुमाऊँ के बहुत से घरों में उगल का आटा छानकर दूध या पानी से पतला घोल बनाया जाता है और थोड़े घी के साथ तवे पर हाथ से फैलाया जाता है (छोली रोटी)। इसे आलू के टुकड़ों और सेंधा नमक के साथ खाया जाता है, समुद्री नमक के साथ नहीं।
चरण 3: भुइयां को बाहर निकालना
- सूप में खील, अनार और अखरोट रखें।
- गन्ने की डंडी से सूप को पीटते हुए घर के हर कोने में जाएँ और साथ-साथ खील बिखेरते चलें।
- बोलें: "आओ लक्ष्मी, बैठो नारायण, निकल घुइयां"। शब्द घर-घर में अलग होते हैं, और कुछ घरों में "भाज भुइयां भाज" भी बोला जाता है।
चरण 4: अखरोट और अनार तोड़ना
- आँगन में ओखल (अनाज कूटने की ओखली) के पास जाएँ, या कुछ घरों में तुलसी के गमले के पास।
- वहाँ एक दीपक जलाएँ।
- वहीं अखरोट और अनार तोड़ें।
चरण 5: लक्ष्मी-नारायण को घर में बुलाना
- फिर से खील बिखेरते हुए घर के भीतर लौट आएँ।
- बोलें: "आ लछमी बैठ नरैणा" या "आओ भैठो लछमी नरैण, भाज भुइयां घर से बाहर"।
- कुछ घरों में सूप को फिर तुलसी के गमले के पास रख दिया जाता है।
चरण 6: पाँच कन्याओं को भोजन कराना
- पूड़ी, बड़े और मिठाई जैसे पारंपरिक पकवान तैयार करें।
- सबसे पहले पाँच कन्याओं को भोजन कराएँ।
- उसके बाद परिवार भोजन करे।
चरण 7: दीपक जलाना (शाम को)
- शाम को देहरी पर दीपक जलाएँ।
- ओखल के पास दीपक जलाएँ।
- तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
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