कंस वध 2026

शुक्रवार, 20 नवंबर 2026

पूजा विधि


यह पर्व कौन मनाता है?

  • भगवान कृष्ण के भक्त: कृष्ण भक्त इस दिन अधर्म पर प्रभु की धर्म-विजय का स्मरण करने और उनकी रक्षा पाने के लिए यह पर्व मनाते हैं।
  • परिवार और साहस की कामना करने वाले: जो लोग भय और अन्याय से मुक्ति चाहते हैं, वे बल और धर्म के लिए भगवान कृष्ण और बलराम से प्रार्थना करते हैं (धर्म विजय)।

पूजा का समय

  • प्रातःकालीन तैयारी: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और दिन का संकल्प लें।
  • मुख्य पूजा मुहूर्त: पूजा सूर्योदय के बाद सुबह की जाती है और दिनभर इस दिन की कथा सुनी जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • संध्या पूजन: शाम को सूर्यास्त के बाद घर के पूजा स्थान पर आरती की जाती है (मथुरा में नगर में कंस वध लीला का मंचन भी होता है)।

पर्व के बारे में

कंस वध एक अत्यंत पूजनीय पर्व है, विशेषकर मथुरा में, जो भगवान कृष्ण की अपने अत्याचारी मामा कंस पर विजय का उत्सव है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है।


कथा (कृष्ण और कंस की कथा)

एक बार की बात है, मथुरा नगरी में क्रूर राजा कंस का शासन था। जब उसने आकाशवाणी सुनी कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसके अंत का कारण बनेगी, तो उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को बंदी बना लिया और उनकी संतानों को एक-एक करके मार डाला। आठवीं संतान भगवान कृष्ण को चुपके से गोकुल पहुँचा दिया गया, जहाँ नंद और यशोदा ने उन्हें पाला।

कंस भयभीत हो उठा और उसने बालक को मारने के लिए अनेक दैत्य भेजे, पर कृष्ण ने सबको पराजित कर दिया। अंत में कंस ने कृष्ण और उनके भाई बलराम को एक भव्य उत्सव के बहाने मथुरा बुलाया, इस आशा से कि वह उन्हें राजकीय मल्लयुद्ध के अखाड़े में मरवा देगा। नगर में प्रवेश करते समय दोनों भाइयों ने उत्सव का विशाल धनुष तोड़ दिया और मदमस्त हाथी कुवलयापीड़ को परास्त किया।

अखाड़े में कृष्ण और बलराम ने प्रसिद्ध पहलवान चाणूर और मुष्टिक को हराया। अपनी योजना विफल होते देख कंस ने क्रोध में भाइयों को पकड़ लेने का आदेश दिया। कृष्ण राजमंच पर कूद पड़े और उस अत्याचारी को परास्त कर मथुरा को उसके शासन से मुक्त कराया। फिर उन्होंने अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव को बंधन से छुड़ाया और कंस के पिता उग्रसेन को पुनः सिंहासन पर बैठाते हुए कहा: "धर्म का राज फिर से स्थापित हो और प्रजा निर्भय होकर जिए।"

तभी से भक्त कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी को कंस वध के दिन के रूप में याद करते हैं और असत्य पर सत्य तथा अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव मनाते हैं।


पूजा सामग्री

सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • मूर्ति / चित्र: भगवान कृष्ण और बलराम की मूर्ति या चित्र (अथवा बाल गोपाल की मूर्ति)
  • तिलक और पूजन सामग्री: रोली, चंदन और अक्षत
  • दीपक और प्रकाश: घी से भरा पीतल या मिट्टी का दीपक और धूप (अगरबत्ती)
  • पवित्र जल पात्र: गंगाजल या स्वच्छ जल से भरा छोटा कलश या पात्र
  • नैवेद्य: पंचामृत, माखन-मिश्री, फल और पेड़ा जैसी मिठाइयाँ
  • पूजा के अन्य सामान: तुलसी दल, फूल, कलावा और पीला वस्त्र (पीतांबर)

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो पीले या सफ़ेद)।
  2. दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान कृष्ण, आज हम अधर्म पर आपकी विजय का स्मरण करते हैं। हमें साहस, शांति और धर्म के मार्ग पर चलने का बल दें।"
  3. दिन को सादा और सात्त्विक रखें और पूरे दिन क्रोध तथा कठोर वाणी से बचें।

चरण 2: पूजा स्थान तैयार करना

  1. पूजा स्थान को स्वच्छ करें और लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएँ।
  2. चौकी पर भगवान कृष्ण और बलराम की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  3. मूर्ति के पास जल से भरा कलश रखें और पूजा की सामग्री उसके बगल में तैयार रखें।

चरण 3: पूजन विधि

  1. दीपक जलाना: प्रभु के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  2. तिलक लगाना: मूर्ति को चंदन, रोली और अक्षत अर्पित करें।
  3. फूल और तुलसी चढ़ाना: ताज़े फूल और तुलसी दल चढ़ाएँ और मूर्ति को पीले वस्त्र पहनाएँ।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: पंचामृत, माखन-मिश्री और मिठाई प्रार्थना के साथ अर्पित करें।

चरण 4: कथा का पाठ

  1. दाहिने हाथ में कुछ चावल के दाने और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
  2. वेदी के सामने श्रद्धा से बैठें और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित कंस वध की कथा भक्तिपूर्वक पढ़ें या सुनें।
  3. कथा के बाद दाने प्रभु के चरणों में अर्पित करें।

चरण 5: आरती और भजन

  1. जलते हुए घी के दीपक से कृष्ण आरती करें और भक्ति भरे भजन गाएँ।
  2. कुछ मिनट पूरे ध्यान से "हरे कृष्ण" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें।
  3. पुष्पांजलि (प्रार्थना के साथ अर्पित मुट्ठी भर फूल) अर्पित करें और प्रभु को प्रणाम करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना

  1. परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें।
  2. प्रसाद परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटें, विशेषकर बच्चों में।
  3. दिन का समापन सादे सात्त्विक भोजन के साथ करें।

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