गुरु रविदास जयंती 2027
शनिवार, 20 फ़रवरी 2027
पूजा विधि
यह पर्व कौन मनाता है?
- गुरु रविदास के भक्त: संत रविदास के अनुयायी इस दिन संत जी को याद करते हैं और उनका आशीर्वाद तथा मार्गदर्शन माँगते हैं।
- परिवार और समाज: परिवार मंदिरों और सत्संग में एकत्र होकर उनके समानता, विनम्रता और भक्ति के संदेश को साझा करते हैं।
- सभी जिज्ञासु: जो भी व्यक्ति संत जी के इस संदेश से प्रेरित है कि ईश्वर के सामने सभी मनुष्य समान हैं, वह प्रार्थना में शामिल हो सकता है।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: स्नान सुबह जल्दी, ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) से किया जाता है। कई भक्त नदी में पवित्र स्नान करते हैं।
- पूजा और आरती: गुरु रविदास की पूजा और आरती सूर्योदय के बाद सुबह की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- शोभा यात्रा और सत्संग: शोभा यात्रा और भजन दिन में बाद में होते हैं (परिवारों और समाजों में रीति अलग-अलग है)।
- लंगर: सत्संग के अंत में आने वाले सभी लोगों के लिए परोसा जाता है।
पर्व के बारे में
गुरु रविदास जयंती उत्तर भारत में प्रेम से मनाया जाने वाला पर्व है, जो संत गुरु रविदास के जन्म का उत्सव है। वे भक्ति आंदोलन के कवि थे, जिन्होंने समानता और ईश्वर-प्रेम की शिक्षा दी। यह पर्व माघ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
कथा (मन चंगा तो कठौती में गंगा की कथा)
बहुत समय पहले पावन नगरी वाराणसी में रविदास नाम के एक मोची रहते थे, जो दिन भर जूते गाँठते थे। वे भक्त संत थे, सादा जीवन जीते थे और हर टाँके के साथ ईश्वर का स्मरण करते थे।
एक दिन गंगा स्नान को जा रहे एक ब्राह्मण अपने जूते गँठवाने रुके। रविदास ने मज़दूरी लेने से मना कर दिया और कहा: "आप मेरी ओर से माँ गंगा को एक पैसा अर्पित कर देंगे, तो वे उसे स्वीकार कर लेंगी।" ब्राह्मण ने वह सिक्का गंगा में चढ़ाया, और यह देखकर चकित रह गया कि नदी से एक हाथ उठा और सिक्का ले लिया। बदले में माँ ने रविदास के लिए सोने का एक कंगन दिया।
ब्राह्मण लालच में आ गया और कंगन अपनी पत्नी को दे दिया। बाद में राजा ने वह कंगन माँगा, तो ब्राह्मण को रविदास के सामने सच स्वीकार करना पड़ा। तब रविदास ने उसे अपनी कठौती (चमड़ा भिगोने की लकड़ी की परात) का जल दिखाया, और उसमें दूसरा कंगन प्रकट हो गया। उस दिन से यह कहावत याद की जाती है: "मन चंगा तो कठौती में गंगा" (यदि मन पवित्र हो, तो गंगा आपकी कठौती में ही है), और भक्त श्रद्धा से उनकी जयंती मनाते हैं।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / प्रतिमा: गुरु रविदास का चित्र या मूर्ति
- तिलक की सामग्री: रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीप और रोशनी: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, तथा अगरबत्ती
- पवित्र जल का पात्र: ताज़े जल या गंगाजल से भरा छोटा पात्र
- भोग (नैवेद्य): फल, खीर, हलवा और कड़ाह प्रसाद
- पूजा की अन्य सामग्री: ताज़े फूल, माला, और संत जी की बाणी की पुस्तक
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, हो सके तो नदी में स्नान करें या नहाने के जल में गंगाजल की कुछ बूँदें डालें, और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे गुरु रविदास, आज हम श्रद्धा से आपकी शिक्षाओं का स्मरण करते हैं। हमें पवित्र हृदय दें और सभी मनुष्यों को समान देखने की शक्ति दें।"
- यह भक्ति का दिन है, कठोर उपवास का नहीं, इसलिए दिन को सादा और सात्त्विक रखें।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी
- अपने कमरे के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व दिशा की दीवार को साफ़ करें।
- गुरु रविदास का चित्र स्वच्छ वस्त्र से ढकी लकड़ी की चौकी पर रखें।
- जल से भरा एक छोटा पात्र चित्र के पास रखें और सारी सामग्री तैयार रखें।
चरण 3: पूजा करना
- दीपक जलाना: गुरु रविदास के चित्र के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
- तिलक लगाना: चित्र को रोली, कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएँ।
- फूल और माला अर्पित करना: ताज़े फूल और माला चढ़ाएँ।
- नैवेद्य अर्पित करना: चित्र के सामने फल, खीर, हलवा और कड़ाह प्रसाद रखें।
चरण 4: बाणी और कथा
- श्रद्धापूर्वक पूजा स्थान के सामने बैठें।
- गुरु रविदास की बाणी, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल शबद भी हैं, पूरे मन और श्रद्धा से पढ़ें या सुनें।
- मन चंगा तो कठौती में गंगा की कथा सुनें और संत जी के संदेश पर मनन करें।
चरण 5: आरती और सत्संग
- जलते घी के दीपक से गुरु रविदास की आरती करें और भजन गाएँ।
- हो सके तो मंदिर में सत्संग, भजन और शोभा यात्रा (नगर कीर्तन) में शामिल हों।
- चित्र के सामने प्रणाम करें और शांति, एकता तथा सबके कल्याण की प्रार्थना करें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
- प्रसाद परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटें।
- लंगर, यानी सामूहिक भोजन, छकें और सादा सात्त्विक भोजन ग्रहण करें।
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