करवा चौथ 2026

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

पूजा विधि: पंजाब (करवा चौथ)


यह व्रत कौन करे?

  • विवाहित महिलाएँ: पत्नियाँ अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि (अखंड सौभाग्य) के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं।
  • नवविवाहित महिलाएँ: नई बहुएँ परिवार के आशीर्वाद और उपहारों के साथ अपना पहला करवा चौथ रखती हैं, और जो बहू मायके में हो, उसे सास की भेजी हुई सरगी वहीं मिलती है।

पूजा का समय

  • सरगी: सूर्योदय से पहले, सुबह के शुरुआती घंटों में, व्रत शुरू होने से पहले खाई जाती है; इसे सास देती हैं।
  • पूजा मुहूर्त: करवा चौथ की पूजा शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में, चंद्रमा के उदय से पहले की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • चंद्र दर्शन: चंद्रमा को तभी देखें और अर्घ्य दें जब वह आपके शहर में उदित हो जाए; चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने शहर का चंद्रोदय समय इसी पृष्ठ पर देखें।
  • व्रत खोलना: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद।

पर्व के बारे में

करवा चौथ उत्तर भारत का एक अत्यंत श्रद्धेय पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और कुशलता के लिए बिना अन्न-जल के कठिन व्रत रखती हैं। पंजाबी परिवारों में इसकी पहचान सास की दी हुई सरगी, शाम की कथा और करवा चौथ का गीत गाने से है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (वीरवती की कथा)

बहुत समय पहले की बात है, वेदधर्मा नाम के एक ब्राह्मण थे और उनकी एक लाड़ली बेटी थी वीरवती। विवाह के बाद वीरवती ने बड़ी श्रद्धा से करवा चौथ का व्रत रखा, बिना अन्न और जल के।

दिन ढलते-ढलते भूख और प्यास से वह निढाल हो गई, और उसके भाइयों से उसका कष्ट देखा नहीं गया। उनमें से एक भाई पीपल के पेड़ पर दीपक और छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक को छलनी की ओट में इस तरह रखा कि वह उगते चंद्रमा जैसा दिखे (कुछ कथाओं में दर्पण)। उसे चंद्रमा समझकर वीरवती ने व्रत खोल लिया। पहले कौर पर उसे छींक आई, दूसरे में बाल निकला, और तीसरे के साथ पति के निधन का समाचार आ गया।

शोक से व्याकुल होकर वह बहुत रोई, तब माता पार्वती उसके सामने प्रकट हुईं और बताया कि सच्चा चंद्रमा उगने से पहले ही उसने अपना व्रत तोड़ दिया था। देवी ने उसे समझाया: "श्रद्धा और भक्ति के साथ करवा चौथ का व्रत एक बार फिर करो, और सच्चा चंद्रमा उदित होने के बाद ही अर्घ्य देना।"

वीरवती ने पूरे मन से देवी की बात मानी, और देवी के आशीर्वाद से उसका पति फिर जीवित हो उठा। उसी दिन से विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुख के लिए करवा चौथ का व्रत रखती आ रही हैं।


पूजा सामग्री

शाम की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / तस्वीर: करवा माता (माता पार्वती) का भगवान शिव और भगवान गणेश के साथ चित्र
  • तिलक और पावन चूर्ण: रोली, कुमकुम, सिंदूर और अक्षत
  • दीपक: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती
  • करवा और छलनी: जल से भरा टोंटीदार मिट्टी का करवा, और चंद्रमा को देखने के लिए छलनी
  • थाली और नैवेद्य: हर महिला के लिए पूजा की थाली, और नैवेद्य के लिए मिठाई तथा फल
  • पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, कलावा और सास के लिए उपहार, यानी बायना

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातः तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जागें और सास की दी हुई सरगी खाएँ, जिसमें फेनी हमेशा होती है। फिर स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे करवा माता, आज मैं अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और कुशलता के लिए यह व्रत रख रही हूँ। मुझे शुद्ध भक्ति से यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
  3. दिन भर बिना अन्न-जल के व्रत रखें, जब तक शाम को चंद्रमा के दर्शन न हो जाएँ।

चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी (दोपहर बाद)

  1. अपने कमरे के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) या पूर्वी दीवार को साफ करें।
  2. लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ लाल वस्त्र बिछाकर उस पर देवी का चित्र रखें।
  3. जल से भरा करवा, दीपक और अक्षत चित्र के पास रखें।

चरण 3: संध्या की पूजा

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर देवी के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: चित्र और करवे पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और करवे पर लाल कलावा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: मिठाई और फल देवी के सामने रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाएँ हाथ में गेहूँ या चावल के कुछ दाने और फूलों की कुछ पंखुड़ियाँ लें।
  2. परिवार की अन्य महिलाओं के साथ अपनी पूजा की थालियाँ लेकर गोल घेरे में बैठें, और पूरे ध्यान और श्रद्धा से वीरवती की करवा चौथ व्रत कथा सुनें।
  3. फिर पंजाबी परिवारों की रीति से थालियों को घेरे में सात बार घुमाएँ और करवा चौथ का गीत (फेरी) गाएँ। इसके बोल बताते हैं कि इस दिन क्या नहीं किया जाता: चरखा कातना या कपड़ा बुनना नहीं, सिलाई नहीं, रूठे हुए को मनाना नहीं, सोए हुए को जगाना नहीं, और पड़ोसी के घर जाना नहीं।
  4. कथा और गीत पूरा होने पर हाथ में लिए दाने देवी के चरणों के पास छोड़ दें।

चरण 5: आरती और अर्घ्य (चंद्र दर्शन)

  1. जलते घी के दीपक से करवा माता की आरती करें और भजन गाएँ।
  2. चंद्रमा के उदित होने पर करवा और छलनी लेकर बाहर जाएँ, और छलनी से चंद्रमा को देखें (कुछ परिवार जल से भरे बर्तन में उसका प्रतिबिंब देखते हैं, या दुपट्टे की ओट से)।
  3. चंद्रमा को देखते हुए धीरे-धीरे जल चढ़ाकर अर्घ्य दें, और अपने पति की लंबी आयु और सुख की प्रार्थना करें।
  4. फिर उसी छलनी से अपने पति को देखें।

चरण 6: आशीर्वाद और व्रत खोलना

  1. परिवार के बड़ों के, विशेषकर सास के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें, और उन्हें बायना दें (बहुत से परिवारों में वह महिला की अपनी माँ की ओर से आता है)।
  2. पति के हाथ से पहला घूँट जल पीकर आप व्रत खोलें।
  3. प्रसाद परिवार के सदस्यों में बाँटें और सादा सात्विक भोजन करें।

पूजा विधि: राजस्थान (चौथ माता)


यह व्रत कौन करे?

  • सुहागिन महिलाएँ: विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
  • चौथ माता को पूजने वाली महिलाएँ: जिन परिवारों में इस दिन चौथ माता की पूजा होती है, उनकी महिलाएँ अपने घर की परंपरा के अनुसार माता का आशीर्वाद पाने के लिए यह व्रत करती हैं।

पूजा का समय

  • व्रत: सुबह से चंद्रमा के उदय होने तक रखा जाता है; चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले कुछ नहीं खाया जाता।
  • पूजा मुहूर्त: चौथ माता की पूजा शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में, चंद्रोदय से पहले की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • चंद्र दर्शन: चंद्रमा के आपके शहर में उदय होने के बाद ही अर्घ्य दें; चंद्रोदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने शहर का चंद्रोदय समय इसी पृष्ठ पर देखें।
  • व्रत खोलना: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद।

पर्व के बारे में

करवा चौथ राजस्थान का एक प्रिय पर्व है, जिसमें सुहागिन महिलाएँ उपवास रखती हैं और पति की लंबी आयु के लिए माता पार्वती के स्वरूप चौथ माता की पूजा करती हैं। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त बूंदी के चौथ माता मंदिर में भी देवी के दर्शन करते हैं, जहाँ मेला लगता है।


व्रत कथा (चौथ माता की कहानी)

एक समय की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। सातों भाई अपनी बहन के बिना कभी भोजन नहीं करते थे। कार्तिक की चौथ के व्रत के दिन भाइयों ने कहा, "आ बहन, भोजन कर ले।" बहन बोली, "आज मेरा करवा चौथ का व्रत है, मैं चंद्रमा उगने के बाद ही भोजन करूँगी।" भाइयों से बहन की भूख देखी नहीं गई। एक भाई ने दीपक लिया, दूसरे ने छलनी ली, और दोनों टीबे (रेत के ऊँचे टीले) की ओट में चले गए। वहाँ दीपक जलाकर उसे छलनी से ढक दिया। फिर लौटकर बोले, "बहन, देख, चाँद उग आया है। जा, अर्घ्य दे ले।" बहन ने भाभियों से साथ चलने को कहा, तो वे बोलीं, "बाईजी, आपका ही चाँद उगा है, हमारा तो रात में उगेगा।" भोली बहन यह बात समझ नहीं पाई। उसने अर्घ्य दिया और भाइयों के साथ भोजन करने बैठ गई।

कुछ दिन बाद मार्गशीर्ष की चौथ आई और बोली, "करवो ले, भाइयों की बहन, करवो ले। करवो ले, व्रत तोड़ने वाली, करवो ले।" साहूकार की बेटी ने चौथ के पैर पकड़ लिए और कहा, "आपको मुझे मेरा सुहाग लौटाना ही पड़ेगा।" मार्गशीर्ष की चौथ ने कहा, "पौष की चौथ मुझसे बड़ी है, वही तुझे तेरा सुहाग देगी।" इसी तरह आगे हर महीने की चौथ आती गई और उसे अगली, बड़ी चौथ के पास भेजती गई।

अंत में आश्विन की चौथ आई और उससे कहा: "कार्तिक की चौथ तुझसे नाराज़ है। तू उसके पैरों में पड़ जा, वही तुझे तेरा सुहाग देगी।" फिर गरजती-घुमड़ती करवा चौथ स्वयं आई और बोली, "करवो ले, भाइयों की प्यारी बहन, करवो ले। करवो ले, दिन में चाँद उगाने वाली, व्रत तोड़ने वाली, करवो ले।" साहूकार की बेटी ने उनके पैर पकड़ लिए और रोते हुए प्रार्थना की, "हे चौथ माता, मुझे मेरा सुहाग लौटा दो। मेरी भूल क्षमा करो।" चौथ माता ने कहा, "बेवक्त चाँद उगाने वाली, अब मेरे पैर क्यों पकड़ती है?" पर बेटी बार-बार क्षमा माँगती रही।

उसके आँसू और पश्चाताप से प्रसन्न होकर चौथ माता ने उसकी अंगुली से मेहंदी, आँख से काजल और टीके से रोली लेकर उस पर छींटा दिया। छींटा पड़ते ही उसका पति जीवित होकर उठ बैठा। पति-पत्नी ने बड़े उत्साह से चौथ माता का पूजन किया, चूरमा बनाया, कहानी सुनी और करवा चढ़ाया। माता को प्रणाम करके दोनों ने भोजन किया और चौपड़-पासे खेलने लगे। दासी भोजन लेकर आई, तो उन्हें खेलते देख उसने सास को जाकर बताया। सास ऊपर आईं और बेटे को जीवित और स्वस्थ देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पूछा कि यह कैसे हुआ, तो बहू बोली, "करवा चौथ माता ने मुझे सुहाग का वरदान दिया है।" उसने सास के पैर छुए और सास ने उसे सुहाग का खूब आशीर्वाद दिया। उस दिन से महिलाएँ करवा चौथ का व्रत रखती और चौथ माता का पूजन करती हैं और प्रार्थना करती हैं, "हे चौथ माता, जैसे साहूकार की बेटी को सुहाग दिया, वैसे ही हम सबको देना।"


पूजा सामग्री

शाम की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र: चौथ माता का चित्र, या दीवार पर बनाया उनका स्वरूप
  • तिलक सामग्री: रोली और अक्षत
  • दीपक: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती
  • करवा और जल: अर्घ्य के लिए ताज़े जल से भरा मिट्टी का करवा
  • नैवेद्य: घी और गुड़ से बना चूरमा
  • पूजा के अन्य सामान: फूल और कलावा

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकाल की तैयारी और संकल्प

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प लें: "हे चौथ माता, आज मैं अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रख रही हूँ। मुझे चंद्रमा उगने तक पूरी श्रद्धा से इसे निभाने की शक्ति दें।"
  3. दिन भर कुछ न खाएँ, चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अन्न ग्रहण करें।

चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी

  1. घर में पूजा के लिए एक स्थान साफ़ करें।
  2. दीवार पर चौथ माता का चित्र बनाएँ या उनकी तस्वीर लगाएँ।
  3. चित्र के सामने जल से भरा करवा रखें और भोग के लिए चूरमा तैयार रखें।

चरण 3: चौथ माता का पूजन

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर चौथ माता के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: चौथ माता के चित्र और करवे पर रोली और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और करवे पर कलावा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: घी और गुड़ का चूरमा चौथ माता को अर्पित करें।

चरण 4: चौथ माता की कहानी सुनना

  1. घर की अन्य महिलाओं के साथ श्रद्धा से पूजा स्थान के सामने बैठें; परंपरा से कहानी घर की बड़ी महिलाएँ सुनाती हैं।
  2. पूरे ध्यान से चौथ माता की कहानी सुनें और बीच-बीच में "हुंकारा" (हामी का शब्द) भरती रहें।
  3. अंत में प्रार्थना करें: "हे चौथ माता, जैसे साहूकार की बेटी को सुहाग दिया, वैसे ही हमें भी देना।" जिन परिवारों में व्रत रखने वाली अन्य महिलाओं के साथ करवे बदले जाते हैं, वे सात बार बदलते हैं।

चरण 5: अर्घ्य (चंद्र दर्शन)

  1. आपके शहर में चंद्रमा उदय हो जाने के बाद जल से भरा करवा लेकर बाहर आएँ।
  2. करवे से जल धीरे-धीरे चढ़ाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें और प्रणाम करें।
  3. पति की लंबी आयु और अपने सुहाग की अखंडता के लिए प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. सासू माँ और घर के अन्य बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
  2. चूरमे का प्रसाद परिवार में बाँटें।
  3. प्रसाद और सादे सात्विक भोजन से अपना व्रत खोलें।

पूजा विधि: उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी


यह व्रत कौन करे?

  • सुहागिन महिलाएँ: विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख के लिए यह व्रत रखती हैं और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद माँगती हैं।
  • नवविवाहिताएँ: नई बहुएँ अपना पहला करवा चौथ विशेष श्रद्धा से करती हैं और करवा माता तथा घर के बड़ों का आशीर्वाद पाती हैं।

पूजा का समय

  • सरगी: आपकी सास के हाथ से मिली सरगी सुबह सूर्योदय से पहले, तड़के खाई जाती है और इसके बाद व्रत शुरू होता है। सरगी में दूध और चीनी के साथ सूत फेनी भी होती है।
  • पूजा मुहूर्त: करवा चौथ की पूजा शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में, चंद्रमा के उदय से पहले की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • चंद्र दर्शन: चंद्रमा को देखकर अर्घ्य तभी दें जब वह आपके शहर में उदय हो चुका हो। चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने शहर का चंद्रोदय समय इसी पृष्ठ पर देखें।
  • व्रत खोलना: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद, जब आपके पति आपको जल का पहला घूँट पिलाएँ।

पर्व के बारे में

करवा चौथ उत्तर भारत का एक अत्यंत श्रद्धेय पर्व है, जिसमें सुहागिन महिलाएँ कठोर निर्जला व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु और कुशलता के लिए पूजा करती हैं। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (करवा और सात भाइयों की कथा)

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम करवा था। सातों भाई अपनी बहन से इतना स्नेह करते थे कि जब तक वह भोजन न कर ले, वे स्वयं नहीं खाते थे। विवाह के बाद एक बार करवा मायके आई हुई थी, और उन्हीं दिनों करवा चौथ का दिन आ गया। उसने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखा, और उसे चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना था।

शाम होते-होते करवा भूख और प्यास से व्याकुल हो गई, पर चंद्रमा अभी निकला नहीं था। सबसे छोटे भाई से बहन की यह दशा देखी नहीं गई। उसने दूर एक पीपल के पेड़ पर दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख दिया, जो देखने में उदित होते चंद्रमा जैसा लगता था। करवा ने भाई की बात मान ली, उस रोशनी को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई। पहले निवाले पर उसे छींक आई, दूसरे में बाल निकला, और तीसरा निवाला उठाते ही पति के निधन का समाचार आ गया। तब भाभी ने उसे बताया कि सच्चे चंद्रमा के उदय से पहले ही व्रत टूट जाने के कारण यह हुआ है।

करवा ने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। वह पूरे एक साल तक पति के शव के पास बैठकर उसकी सेवा करती रही और उस पर उगने वाली सूई जैसी घास को सँजोकर रखती रही। अगले करवा चौथ पर भाभियों ने व्रत रखा और उससे आशीर्वाद लेने आईं। करवा ने हर भाभी से विनती की, "यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो," और हर भाभी उसे अगली के पास भेजती गई। छठी भाभी ने उसे समझाया: "तुम्हारा व्रत सबसे छोटे भाई की युक्ति से टूटा था, इसलिए तुम्हारे पति को जीवित करने की शक्ति केवल उसकी पत्नी में है। उसे कसकर पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जीवित न कर दे, उसे मत छोड़ना।"

करवा ने छोटी भाभी को पकड़ लिया और उसके छुड़ाने पर भी नहीं छोड़ा। करवा की तपस्या देखकर भाभी का मन पसीज गया। उसने अपनी छोटी उँगली चीरकर उसमें से अमृत की बूँद पति के मुँह में डाल दी। पति तुरंत श्रीगणेश का नाम लेता हुआ उठ बैठा और करवा को उसका सुहाग वापस मिल गया। तभी से सुहागिन महिलाएँ अखंड सौभाग्य के आशीर्वाद के लिए करवा चौथ का व्रत रखती आ रही हैं।


पूजा सामग्री

शाम की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • करवा और छलनी: टोंटी वाला मिट्टी का करवा, जिसमें स्वच्छ जल भरा हो, और चंद्रमा देखने के लिए छलनी
  • दीवार पर चित्र: स्वच्छ दीवार पर करवा माता, शिव परिवार और करवे का चित्र बनाने के लिए चावल का घोल (या करवा माता का छपा हुआ चित्र)
  • तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम और अक्षत
  • कथा के दाने: गेहूँ या चावल के तेरह दाने
  • दीपक और ज्योति: घी और रुई की बाती के साथ मिट्टी या पीतल का दीपक
  • पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, कलावा, फल और घर की बनी मिठाई

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. सूर्योदय से पहले उठें, सास की दी हुई सरगी खाएँ, फिर स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो लाल, पीले या गुलाबी रंग के; काले वस्त्र न पहनें)।
  2. दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे करवा माता, आज मैं अपने पति की लंबी आयु और कुशलता के लिए यह व्रत रख रही हूँ। मुझे शुद्ध श्रद्धा से यह व्रत पूरा करने की शक्ति दीजिए।"
  3. दिन भर बिना अन्न-जल के व्रत रखें और शाम को चंद्रमा के दर्शन तक उपवास करें।

चरण 2: पूजा की दीवार तैयार करना (अपराह्न)

  1. पूजा के कक्ष की किसी दीवार या घर के ईशान कोण को साफ़ करें।
  2. दीवार पर चावल के घोल से करवा, करवा माता और शिव परिवार का चित्र बनाएँ (या करवा माता का छपा चित्र लगाएँ)। लखनऊ के कुछ घरों में पूजा ओखल पर की जाती है।
  3. दीवार के सामने चौकी रखें और उस पर जल से भरा करवा रखें। करवे पर रोली की तेरह बिंदियाँ लगाएँ।

चरण 3: संध्या की पूजा

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर दीवार पर बने चित्र के सामने रखें।
  2. तिलक लगाना: करवा माता और करवे को रोली, कुमकुम और अक्षत से तिलक करें।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और करवे पर कलावा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: फल और घर की बनी मिठाई देवी के सामने रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाएँ हाथ में गेहूँ या चावल के तेरह दाने लेकर दीवार के सामने बैठें और पूरे ध्यान और श्रद्धा से करवा चौथ की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  2. कथा के बाद दाने करवे के पास रख दें। फिर अन्य महिलाओं के साथ गोल घेरे में बैठकर आपस में सात बार करवे बदलें और पारंपरिक करवा गीत गाएँ (उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में महिलाएँ अपनी थालियाँ भी घेरे में घुमाती हैं)।
  3. करवे पर हाथ घुमाकर सास के चरण छुएँ और उन्हें वह करवा बायना (आदर के उपहार) के रूप में दें। कुछ परिवारों में यह जेठानी या ननद जैसी किसी बड़ी को दिया जाता है।

चरण 5: आरती और अर्घ्य (चंद्र दर्शन)

  1. जलते घी के दीपक से करवा माता की आरती करें और भजन गाएँ।
  2. आपके शहर में चंद्रमा उदय होने पर छलनी और जलता दीपक लेकर बाहर आएँ और छलनी से चंद्रमा को देखें (कुछ घरों में चंद्रमा को जल से भरे पात्र में या दुपट्टे के पार देखा जाता है)।
  3. जल के पात्र से चंद्रमा की ओर धीरे-धीरे जल गिराकर अर्घ्य दें और पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें।
  4. मुड़कर उसी छलनी से अपने पति को देखें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. पति और परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।
  2. पति के हाथ से पहले जल का घूँट और फिर भोजन का पहला कौर ग्रहण करें।
  3. प्रसाद और सादा सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलें, और मीठा प्रसाद परिवार में बाँटें।

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  • दीपावली: 6 नवंबर 2026 – 11 नवंबर 2026
  • काली पूजा: 8 नवंबर 2026
  • केदार गौरी व्रत: 8 नवंबर 2026
  • सोमवती अमावस्या: 9 नवंबर 2026
  • चित्रगुप्त पूजा: 11 नवंबर 2026
  • छठ पूजा: 13 नवंबर 2026 – 16 नवंबर 2026