निर्जला एकादशी 2027
सोमवार, 14 जून 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- भगवान विष्णु के भक्त: विष्णु के उपासक एकादशी के इस सबसे कठोर व्रत को बिना अन्न-जल के रखते हैं, ताकि उन्हें वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का पुण्य मिले।
- पुण्य और मोक्ष चाहने वाले: बहुत से लोग पाप धोने और मोक्ष (मोक्ष) के मार्ग पर प्रभु की कृपा पाने के लिए यह व्रत रखते हैं।
- हर एकादशी का व्रत न कर पाने वाले: जो भक्त वर्ष भर की सभी एकादशियाँ नहीं कर पाते, वे इस एक दिन पूरे नियम से व्रत रखते हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: ब्रह्म मुहूर्त में या सुबह जल्दी स्नान के बाद संकल्प लिया जाता है और व्रत सूर्योदय से आरंभ होता है।
- विष्णु पूजा: मुख्य पूजा सुबह की जाती है, और शाम को प्रभु का फिर स्मरण किया जाता है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- रात्रि जागरण: बहुत से भक्त रात में जागकर भजन गाते हैं और विष्णु कथा पढ़ते हैं।
- व्रत खोलना (पारण): व्रत अगली सुबह द्वादशी को, प्रातःकालीन पूजा के बाद पारण के समय के भीतर खोला जाता है। अपने शहर का पारण समय इसी पृष्ठ पर देखें।
पर्व के बारे में
निर्जला एकादशी वैष्णवों का एक अत्यंत श्रद्धेय व्रत है, जो पूरे भारत में रखा जाता है और जिसमें भक्त भगवान विष्णु के लिए अन्न तो क्या, जल की एक बूँद भी ग्रहण नहीं करते। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है।
व्रत कथा (भीम की कथा)
जब महर्षि व्यास ने पांडवों को हर एकादशी का व्रत करने का पुण्य बताया, तो भाइयों में दूसरे भीम चिंतित हो उठे। उनकी विशाल भूख, जिसके कारण वे वृकोदर कहलाते थे, ऐसी थी कि वे एक दिन भी बिना भोजन के नहीं रह सकते थे।
भीम व्यास जी के पास गए और बोले कि वे भी अपने भाइयों और द्रौपदी के समान पुण्य पाना चाहते हैं, पर भूख के कारण हर एकादशी का व्रत करना उनके लिए असंभव है। उन्होंने एक ऐसा व्रत पूछा जिससे उन्हें पूरा फल मिल जाए।
महर्षि ने करुणा से उत्तर दिया: "ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत बिना अन्न और जल की एक बूँद लिए करो। इस एक व्रत को पूरे नियम से रखो, तो यह चौबीसों एकादशियों का पुण्य देगा।"
भीम ने बड़े दृढ़ निश्चय से यह सलाह मानी। उन्होंने गर्मी और अपनी भूख दोनों सहे और श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा की। उनके प्रयास से प्रसन्न होकर प्रभु ने उन्हें पूरे वर्ष के व्रतों का पुण्य प्रदान किया। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है, और भक्त इसे श्रद्धा तथा नियम से रखते हैं।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति (या माता लक्ष्मी सहित भगवान विष्णु की)
- तिलक और पवित्र चूर्ण: चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और ज्योति: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती
- पवित्र जल का पात्र: पूजा और दान के लिए ताज़े जल से भरा कलश
- नैवेद्य: फल और मिठाइयाँ (प्रभु को अर्पित करें और व्रत खोलने के बाद ही बाँटें)
- पूजा के अन्य सामान: तुलसी दल, पीले फूल, अगरबत्ती और कलावा
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो पीले या सफ़ेद)।
- दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे भगवान विष्णु, आज हम यह निर्जला एकादशी का व्रत बिना अन्न-जल के रखते हैं। हमें शुद्ध भक्ति से यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
- दिन और रात भर बिना अन्न और जल के व्रत रखें। (जो पूरा व्रत न कर सकें, वे अपने स्वास्थ्य के अनुसार केवल फल और जल ले सकते हैं।)
चरण 2: पूजा की चौकी तैयार करना
- अपने घर या पूजा स्थान के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) की सफ़ाई करें।
- भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति को स्वच्छ पीले वस्त्र से ढकी चौकी पर रखें।
- कलश को मूर्ति के पास चावल के दानों की छोटी ढेरी पर रखें और तुलसी दल, फूल तथा नैवेद्य सजाएँ।
चरण 3: विष्णु पूजन
- दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु के सामने रखें।
- तिलक लगाना: मूर्ति को चंदन, रोली और अक्षत लगाएँ।
- फूल और तुलसी अर्पित करना: पीले फूल और ताज़े तुलसी दल चढ़ाएँ तथा कलश पर कलावा का एक टुकड़ा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: फल और मिठाइयाँ प्रभु के सामने रखें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- श्रद्धा से वेदी के सामने बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति के साथ निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा के बाद हाथ में रखे दाने और पंखुड़ियाँ प्रभु के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और रात्रि जागरण
- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या विष्णु सहस्रनाम का जप करें और जलते हुए घी के दीपक से विष्णु आरती करें।
- शाम को फिर दीपक जलाएँ और प्रभु के सामने प्रार्थना करें।
- रात भजन और प्रार्थना के साथ प्रभु के स्मरण में बिताएँ, और मौसम के अनुसार जल तथा अन्न का दान करें, जैसे जल के घड़े, पंखे या फल।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना (पारण)
- अगली सुबह (द्वादशी) स्नान करें और भगवान विष्णु की छोटी पूजा करें।
- परिवार के बड़ों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लें, और किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को जल, भोजन या वस्त्र दें।
- पारण के समय के भीतर पहले तुलसी जल और प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें, फिर सादा सात्त्विक भोजन करें।
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