शीतला सातम 2027
मंगलवार, 24 अगस्त 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- माताएँ: माताएँ अपने बच्चों को बुखार, चेचक और अन्य रोगों से बचाने के लिए शीतला माता की रक्षा पाने हेतु यह व्रत करती हैं।
- परिवार: पूरा परिवार केवल ठंडा, पहले से बना भोजन खाकर इसमें भाग लेता है और अच्छे स्वास्थ्य तथा रोगों से मुक्ति की प्रार्थना करता है (आरोग्य)।
पूजा का समय
- एक दिन पहले (रांधण छठ): शीतला सातम का सारा भोजन एक दिन पहले बना लिया जाता है, और रात तक चूल्हा साफ़ करके उसकी आग बुझा दी जाती है।
- प्रातःकालीन पूजा: स्नान के बाद सुबह एक दिन पहले बने ठंडे भोजन से शीतला माता की पूजा की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- प्रसाद ग्रहण: परिवार दिन भर केवल ठंडा भोजन करता है; आग नहीं जलाई जाती और कुछ भी ताज़ा नहीं पकाया जाता।
पर्व के बारे में
शीतला सातम गुजरात का प्रिय पर्व है, जिसमें परिवार शीतलता और आरोग्य देने वाली माता शीतला की पूजा करते हैं और केवल ठंडा भोजन खाते हैं। यह पर्व श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है।
व्रत कथा (शीतला माता की कथा)
एक समय की बात है, एक गाँव में एक बुढ़िया अपनी दो बहुओं के साथ रहती थी, और दोनों बहुओं के एक-एक छोटा बेटा था। रीति के अनुसार शीतला सातम की पूर्व संध्या पर चूल्हा बुझा दिया जाता था और सारा भोजन एक दिन पहले ही बना लिया जाता था, ताकि देवी के दिन केवल ठंडा भोजन खाया जाए।
उस वर्ष छोटी बहू ने, जिसके यहाँ नवजात शिशु था, उसी दिन ताज़ा भोजन पका लिया। मौसम के जलते बुखार से बच्चों की रक्षा करने वाली शीतला माता इस व्रत-भंग से अप्रसन्न हो गईं। कुछ ही समय बाद दोनों बच्चों को बुखार और चेचक ने जकड़ लिया और जल्द ही वे निष्प्राण हो गए। दुखी दोनों स्त्रियाँ बच्चों को उठाकर रोती और खुद को कोसती हुई जंगल की ओर निकल पड़ीं।
रास्ते में उन्हें एक पेड़ के नीचे एक बुढ़िया लेटी मिली, जिसका शरीर ताप से जल रहा था और घावों से भरा था। करुणा से भरकर दोनों स्त्रियाँ अपना दुख भूल गईं और जब तक उसकी पीड़ा कम नहीं हुई, उसके शरीर पर ठंडा दही लगाती रहीं।
वह बुढ़िया स्वयं शीतला माता ही थीं। वे प्रसन्न हुईं और उन्हें सीख दी: "तुमने शुद्ध मन से मेरी सेवा की है। घर जाओ और श्रद्धा से मेरा व्रत करो। मेरे दिन कभी चूल्हा मत जलाना और केवल ठंडा भोजन खाना, तुम्हारे बच्चे सुरक्षित रहेंगे।" उनकी कृपा से बच्चे ऐसे उठ बैठे जैसे नींद से जागे हों। उसी दिन से माताएँ अपने परिवार के स्वास्थ्य के लिए शीतला सातम का व्रत करती हैं, देवी की पूजा करती हैं और ठंडा भोजन खाती हैं।
पूजा सामग्री
सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: शीतला माता का चित्र या छोटी मूर्ति
- तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत
- दीपक और ज्योति: घी और रुई की बाती वाला मिट्टी का दीपक (एक दिन पहले की ज्योति से या माचिस से जलाएँ, जैसा परिवार में चलन हो)
- जल पात्र: ठंडे जल से भरा छोटा कलश या पात्र
- नैवेद्य: एक दिन पहले बने ठंडे व्यंजन, जैसे थेपला, पूरी, दही, कंसार या सुखड़ी, और उबली हुई मूँग
- अन्य पूजन सामग्री: फूल, कलावा और हल्दी का लेप
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- सुबह जल्दी उठें, ठंडे जल से स्नान करें और स्वच्छ, हल्के रंग के वस्त्र पहनें।
- दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे जगन्माता शीतला, आज मैं अपने बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य तथा रक्षा के लिए आपका व्रत करती हूँ। हमें बुखार और रोगों से बचाए रखें।"
- दिन भर चूल्हा न जलाएँ और कुछ भी ताज़ा न पकाएँ; परिवार केवल एक दिन पहले बना भोजन खाता है।
चरण 2: पूजा स्थान तैयार करना
- घर में एक स्थान साफ़ करें और उस पर ठंडा जल छिड़कें।
- शीतला माता का चित्र या मूर्ति स्वच्छ वस्त्र बिछी लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें।
- देवी के पास जल से भरा कलश रखें और उनके सामने थाली में ठंडा नैवेद्य सजाएँ।
चरण 3: पूजन क्रिया
- दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर शीतला माता के सामने रखें।
- तिलक लगाना: देवी के चित्र और कलश को रोली, हल्दी और अक्षत से तिलक करें।
- फूल अर्पित करना और कलावा बाँधना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और कलश पर कलावा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: देवी को ठंडे व्यंजन और थोड़ा दही अर्पित करें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाहिने हाथ में थोड़े चावल और कुछ फूल की पंखुड़ियाँ लें।
- देवी के सामने श्रद्धापूर्वक बैठकर पूरे ध्यान और भक्ति से शीतला माता की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा के बाद हाथ में लिए हुए अक्षत देवी के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और प्रार्थना
- जलते हुए घी के दीपक से शीतला माता की आरती करें और भक्ति भजन गाएँ।
- कलश से जल देवी को अर्पित करें और बच्चों के स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
- देवी को अर्पित जल की कुछ बूँदें आशीर्वाद के रूप में बच्चों पर छिड़कें।
चरण 6: आशीर्वाद और प्रसाद वितरण
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
- ठंडा प्रसाद परिवार के सदस्यों और बच्चों में बाँटें।
- दिन के भोजन में ठंडा भोजन करें, और व्रत पूरा होने तक चूल्हा न जलाएँ।
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