वट सावित्री व्रत 2027
4 जून 2027 – 18 जून 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- विवाहित महिलाएँ: विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और कुशलता (अखंड सौभाग्य) के लिए यह व्रत रखती हैं।
- अच्छा वर चाहने वाली महिलाएँ: अविवाहित और नवविवाहित महिलाएँ भी स्नेही व समर्पित जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से इसे रखती हैं।
पूजा का समय
- प्रातः स्नान: सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में, स्नान करें और दिन भर का संकल्प लें।
- वट पूजा: व्रत का मुख्य अनुष्ठान, वट वृक्ष की पूजा, सुबह या दिन में की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- उपवास: पूजा, कथा और परिक्रमा पूरी होने तक दिन भर रखा जाता है (कुछ परिवार बिना जल का कठोर उपवास रखते हैं)।
- व्रत खोलना: पूजा पूरी होने के बाद, या परिवार की परंपरा के अनुसार अगली सुबह।
पर्व के बारे में
वट सावित्री व्रत पूरे भारत में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाने वाला पर्व है, जिसमें विवाहित महिलाएँ वट वृक्ष की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। यह पर्व ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है (कुछ क्षेत्रों में इसे पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है)।
व्रत कथा (सावित्री और सत्यवान की कथा)
एक समय की बात है, राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री नाम की एक राजकन्या थी। उसने वन में अपने अंधे माता-पिता के साथ रहने वाले राजकुमार सत्यवान को अपना पति चुना, यद्यपि देवर्षि नारद ने उसे बताया था कि सत्यवान के भाग्य में केवल एक वर्ष का जीवन शेष है।
सावित्री ने गहरी श्रद्धा से अपने पति और सास-ससुर की सेवा की। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, वह उसके साथ वन गई। लकड़ी काटते समय सत्यवान को चक्कर आया और वह एक वट वृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर गिर पड़ा। मृत्यु के देवता यमराज उसके प्राण लेने आ पहुँचे।
सावित्री अटल श्रद्धा के साथ यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी। उसके साहस और बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर यमराज ने उसे वर दिए, पर उसके पति का जीवन नहीं दिया। उसने अपने सास-ससुर की दृष्टि और राज्य माँगा, और फिर सौ पुत्र। यमराज ने वे वर दे दिए, तब सावित्री ने कहा: "पति के बिना मुझे पुत्र कैसे हो सकते हैं? उनके प्राण लौटा दीजिए, ताकि आपका वचन सत्य हो।"
उसकी सत्यनिष्ठा और भक्ति से द्रवित होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए। तभी से विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं और वट सावित्री व्रत रखती हैं।
पूजा सामग्री
पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र / मूर्ति: सावित्री और सत्यवान का चित्र या मूर्ति, या घर पर बनाई गई उनकी मिट्टी की आकृतियाँ
- तिलक और पूजन सामग्री: रोली, कुमकुम, हल्दी, सिंदूर और अक्षत
- दीपक और रोशनी: पीतल या मिट्टी का घी का दीपक, रुई की बत्ती, और धूप
- जल पात्र: ताज़े जल से भरा छोटा लोटा या कलश
- भोग (नैवेद्य): भीगे हुए काले चने, आम और कटहल जैसे मौसमी फल, पूरी और मिठाइयाँ
- पूजा की अन्य सामग्री: फूल, कच्चा सूत या कलावा, हाथ का पंखा, और सुहाग की वस्तुएँ जैसे चूड़ियाँ, बिंदी और लाल कपड़ा
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातः तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (हो सके तो लाल, पीले या हरे रंग के), और सुहाग का श्रृंगार करें।
- दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे माता सावित्री, आज मैं अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और कुशलता के लिए यह व्रत रखती हूँ। मुझे इस संकल्प को शुद्ध श्रद्धा से पूरा करने की शक्ति दें।"
- परिवार की परंपरा के अनुसार दिन भर उपवास रखें, ज़रूरत हो तो केवल जल या फल लें।
चरण 2: पूजा की तैयारी (प्रातः)
- पूजा की थाली लेकर वट वृक्ष के पास जाएँ, या यदि वहाँ न जा सकें तो दीवार पर वट वृक्ष का चित्र बनाएँ या उसकी कटी हुई टहनी घर ले आएँ।
- वृक्ष की जड़ के आसपास की जगह साफ़ करें और उसके पास सावित्री और सत्यवान के चित्र रखें।
- वृक्ष के पास थाली में जल का लोटा, फूल, फल और नैवेद्य रखें।
चरण 3: पूजा की विधियाँ
- दीपक जलाना: वट वृक्ष के नीचे घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- तिलक लगाना: वृक्ष और चित्रों को रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत का तिलक लगाएँ।
- जल और फूल अर्पण: वृक्ष की जड़ों में जल चढ़ाएँ और ताज़े फूल अर्पित करें।
- नैवेद्य अर्पण: भीगे हुए चने, फल और मिठाई वृक्ष तथा सावित्री-सत्यवान के सामने रखें।
चरण 4: परिक्रमा और व्रत कथा का पाठ
- वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करते हुए उसके तने पर कच्चा सूत या कलावा लपेटें (कुछ परिवार तीन, पाँच या एक सौ आठ बार परिक्रमा करते हैं)।
- दाहिने हाथ में थोड़े चावल के दाने और फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- वृक्ष के पास आदर से बैठें और वट सावित्री व्रत कथा का पाठ करें या सुनें, फिर चावल और पंखुड़ियाँ वृक्ष की जड़ में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और प्रार्थना
- जलते हुए घी के दीपक से वट वृक्ष और सावित्री की आरती करें और भक्ति भजन गाएँ।
- सेवा के भाव से हाथ के पंखे से वृक्ष को हल्के-हल्के हवा दें।
- माँग में सिंदूर लगाएँ, और पति की लंबी आयु व सुख की प्रार्थना करें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना
- परिवार के बड़ों और अपनी सास के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लें।
- भीगे हुए चने और फल का प्रसाद चढ़ाएँ और उसे परिवार के सदस्यों में बाँटें।
- प्रसाद और सादे सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
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