ज्येष्ठ अष्टमी 2027

शुक्रवार, 11 जून 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • कश्मीरी पंडित परिवार: खीर भवानी के नाम से प्रसिद्ध देवी रागन्या देवी के भक्त परिवार और समाज के कल्याण के लिए इस दिन व्रत और प्रार्थना करते हैं।
  • मंदिर दर्शन के लिए जाने वाले भक्त: श्रद्धालु माँ की रक्षा और शांति पाने के लिए दर्शन करने कश्मीर के तुलमुल्ला में खीर भवानी मंदिर जाते हैं।
  • घर-परिवार के लिए आशीर्वाद चाहने वाले: जो भक्त यात्रा नहीं कर पाते, वे घर पर ही माँ की पूजा करके स्वास्थ्य, सद्भाव और समृद्धि (सुख-शांति) की प्रार्थना करते हैं।

पूजा का समय

  • प्रातःकालीन तैयारी: सुबह जल्दी स्नान करने के बाद भक्त व्रत रखते हैं और दिन का आरंभ प्रार्थना से करते हैं।
  • पूजा मुहूर्त: मुख्य पूजा और देवी को खीर का भोग सूर्योदय के बाद सुबह और पूर्वाह्न में लगाया जाता है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • सायंकालीन आरती: कई परिवार संध्या के समय फिर दीपक जलाते हैं और प्रार्थना करते हैं।

पर्व के बारे में

ज्येष्ठ अष्टमी, जिसे खीर भवानी भी कहते हैं, कश्मीरी पंडितों का अत्यंत पूजनीय पर्व है। इसमें भक्त देवी रागन्या देवी की पूजा करते हैं और तुलमुल्ला में उनके जल-कुंड वाले मंदिर पर विशाल मेला लगता है। यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (माता रागन्या देवी की कथा)

बहुत समय पहले लंका के राजा रावण ने बड़ी भक्ति से देवी रागन्या देवी की उपासना की और उनका आशीर्वाद पाया। वे कई वर्षों तक उसके साथ रहीं और उसके राज्य की रक्षा करती रहीं।

जब रावण का अहंकार और पाप बढ़ने लगे, तो देवी दुखी हुईं और वहाँ से जाना चाहा। बाद में, जब भगवान राम का लंका पर युद्ध निकट आया, तो देवी ने हनुमान से कहा कि वे किसी पवित्र भूमि पर जाना चाहती हैं। उनके कहने पर हनुमान उन्हें कश्मीर ले गए, जहाँ वे तुलमुल्ला के एक पवित्र जल-कुंड में विराजमान हुईं।

देवी ने अपने भक्तों से कहा: "शुद्ध मन से मेरे कुंड पर आओ और मुझे खीर अर्पित करो। जल तुम्हें आने वाले समय का संकेत दिखाएगा। यदि वह निर्मल और श्वेत हो जाए, तो शांति बनी रहेगी, पर यदि वह काला पड़ जाए, तो कठिन दिन आ सकते हैं।"

भक्त सदियों से गहरी आस्था के साथ इस परंपरा का पालन करते आए हैं, व्रत रखकर कुंड पर खीर चढ़ाते हैं। तब से ज्येष्ठ अष्टमी हर वर्ष मनाई जाती है, और भक्त मानते हैं कि जो भी सच्ची भक्ति से माँ के पास आता है, माँ उसकी रक्षा करती हैं।


पूजा सामग्री

सुबह की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / कुंड का जल: माता रागन्या देवी (खीर भवानी) का चित्र, या कुंड के प्रतीक के रूप में स्वच्छ जल का पात्र
  • तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम, चंदन और अक्षत
  • दीप और रोशनी: पीतल या मिट्टी का दीपक, घी और रुई की बाती, तथा अगरबत्ती
  • नैवेद्य: दूध, चावल और चीनी से बनी खीर, तथा फल
  • फूल और अन्य भेंट: ताज़े फूल, हो सके तो सफ़ेद और लाल, तथा चढ़ाने के लिए दूध
  • पूजा की अन्य वस्तुएँ: कलावा और स्वच्छ जल का एक छोटा पात्र

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे जगदंबा माता रागन्या देवी, आज हम शुद्ध भक्ति से यह दिन मना रहे हैं। हमारे परिवार को शांति, स्वास्थ्य और अपनी रक्षा का आशीर्वाद दें।"
  3. दिन भर व्रत रखें और पूजा पूरी होने तक केवल फल और दूध या सादा सात्त्विक भोजन लें (परंपरा हर परिवार में अलग हो सकती है)।

चरण 2: पूजा की चौकी सजाना (सुबह)

  1. पूजा का स्थान साफ़ करें और लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाएँ।
  2. उस पर माता रागन्या देवी का चित्र रखें और पवित्र कुंड के प्रतीक के रूप में उसके सामने जल का एक छोटा पात्र रखें।
  3. चित्र के पास दीपक, फूल और खीर रखें।

चरण 3: पूजन-क्रम

  1. दीपक जलाना: देवी के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
  2. तिलक लगाना: चित्र और जल-पात्र को रोली, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और पात्र पर कलावा का एक टुकड़ा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: खीर, दूध और फल को मुख्य भोग के रूप में माँ के सामने रखें।

चरण 4: प्रार्थना और कथा

  1. दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
  2. वेदी के सामने श्रद्धा से बैठकर माता रागन्या देवी की कथा और अपने परिवार की रीति के अनुसार उनकी स्तुति पढ़ें या सुनें।
  3. प्रार्थना पूरी होने पर हाथ में रखे दाने और पंखुड़ियाँ माँ के चरणों के पास अर्पित कर दें।

चरण 5: आरती और खीर का भोग

  1. जलते घी के दीपक से माता रागन्या देवी की आरती करें और भजन गाएँ।
  2. हाथ जोड़कर खीर और दूध का भोग लगाएँ। तुलमुल्ला के कुंड पर भक्त खीर और दूध जल में अर्पित करते हैं।
  3. अपने परिवार और सभी लोगों की शांति के लिए प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. खीर का प्रसाद परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों में बाँटें।
  3. प्रसाद ग्रहण करके और सादा सात्त्विक भोजन करके अपना व्रत खोलें।

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