बोळ चोथ 2027
शनिवार, 21 अगस्त 2027
पूजा विधि
यह व्रत कौन करे?
- माताएँ: माताएँ अपनी संतान, विशेषकर पुत्रों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं।
- संतान की इच्छुक स्त्रियाँ: संतानहीन स्त्रियाँ भी गाय और बछड़े का आशीर्वाद पाकर संतान-प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।
पूजा का समय
- प्रातःकाल की तैयारी: सुबह जल्दी स्नान करें और संकल्प लें, फिर पूजा स्थान और नैवेद्य तैयार करें।
- पूजा मुहूर्त: गाय और बछड़े की पूजा मध्याह्न काल (दोपहर) के आसपास की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
- कथा और आरती: पूजा पूरी होने के बाद, उसी बैठक में की जाती है।
- दिन का समापन: भोजन पूजा के बाद ही करें, और वह व्रत के नियमों के अनुसार बना हो।
पर्व के बारे में
बोळ चोथ गुजरात का एक प्रिय व्रत है, जिसमें माताएँ गाय और बछड़े (गौ-वत्स) की पूजा करती हैं और अपनी संतान की कुशलता के लिए उपवास रखती हैं। यह पर्व श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
व्रत कथा (गाय और बछड़े की कथा)
एक बार की बात है, एक गाँव में एक संयुक्त परिवार रहता था, जिसमें एक स्नेहमयी सास और एक युवा बहू थी। परिवार के पास एक गाय थी, जिसके एक सुंदर बछड़ा हुआ, जिसे घर में सब बहुत प्यार करते थे।
एक दिन खेत जाने से पहले सास ने बहू से भोजन में एक पकवान बनाने को कहा। युवा बहू उस पकवान का नाम ग़लत समझ बैठी और उसे बछड़े का नाम मानकर बछड़े को ही पका बैठी। परिवार जब घर लौटा तो दुख और भय से वह घबरा गई और उसे समझ नहीं आया कि क्या करे।
अपराधबोध सहन न कर पाने पर उसने अवशेष मिट्टी में दबा दिए और दिव्य माता गौ से प्रार्थना की: "हे गौ माता, मुझसे अनजाने में यह पाप हो गया। मुझे क्षमा करें और प्रायश्चित का अवसर दें।" उसके आँसुओं से द्रवित होकर घर के बड़ों ने उससे कहा कि वह व्रत रखे, पूरी श्रद्धा से गाय और बछड़े की पूजा करे और माता की कृपा पर विश्वास रखे।
बहू ने यह सलाह पूरे मन से मानी और सच्चे हृदय से व्रत किया। उसके पश्चाताप से प्रसन्न होकर गौ माता ने परिवार को आशीर्वाद दिया, और बछड़ा मिट्टी से जीवित, सकुशल और स्वस्थ उठ खड़ा हुआ, जिससे सबको बड़ी ख़ुशी हुई। तभी से माताएँ बोळ चोथ का व्रत रखती हैं और अपनी संतान की रक्षा और लंबी आयु के लिए गाय और बछड़े की पूजा करती हैं।
पूजा सामग्री
दोपहर की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- चित्र या मूर्ति: गाय और बछड़े का चित्र या मिट्टी की मूर्ति (या जहाँ संभव हो, जीवित गाय और बछड़ा)
- तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम और अक्षत
- दीपक: घी और रूई की बत्ती वाला पीतल या मिट्टी का दीपक
- जल पात्र: ताज़े जल से भरा छोटा पात्र या कलश
- नैवेद्य: बाजरे का रोटला, मूँग और अन्य सादे व्यंजन, जो परिवार की परंपरा के अनुसार बिना गेहूँ और बिना कटी सब्ज़ियों के बने हों
- पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, कलावा और गाय के लिए ताज़ा हरा चारा (गौ-घास)
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकाल की तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और साफ़, शुभ वस्त्र पहनें।
- दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लें और संकल्प लें: "हे दिव्य गौ माता, आज मैं अपनी संतान के स्वास्थ्य, लंबी आयु और कुशलता के लिए यह व्रत रख रही हूँ। मुझे शुद्ध श्रद्धा से यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
- सुबह के समय उपवास रखें। भोजन पूजा के बाद ही करें, और कई परिवारों में गेहूँ से बने तथा चाकू से कटे व्यंजन नहीं खाए जाते (परंपरा अलग-अलग होती है)।
चरण 2: पूजा स्थान की तैयारी
- पूजा के स्थान को साफ़ करें और उस पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएँ।
- गाय और बछड़े का चित्र या मूर्ति लकड़ी की चौकी पर रखें, या जीवित गाय और बछड़े की पूजा की तैयारी करें।
- स्वच्छ जल से भरा कलश पूजा स्थान के पास रखें।
चरण 3: मध्याह्न की पूजा
- दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर गाय और बछड़े के सामने रखें।
- तिलक लगाना: गाय, बछड़े और कलश पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
- फूल और कलावा अर्पित करना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और कलश पर कलावा बाँधें।
- नैवेद्य अर्पित करना: तैयार भोजन और ताज़ा चारा देवताओं के सामने अर्पित करें।
चरण 4: व्रत कथा का पाठ
- दाहिने हाथ में थोड़े चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
- पूजा स्थान के सामने आदर से बैठें और पूरे ध्यान और श्रद्धा से बोळ चोथ की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- कथा के बाद हाथ में रखे दाने और पंखुड़ियाँ गाय और बछड़े के चरणों में अर्पित करें।
चरण 5: आरती और प्रार्थना
- जलते हुए घी के दीपक से गौ माता की आरती करें और भक्ति के भजन गाएँ।
- हो सके तो हाथ जोड़कर गाय और बछड़े की परिक्रमा करें।
- अपनी संतान की लंबी आयु और सुख की प्रार्थना करें।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
- प्रसाद परिवार के सदस्यों और बच्चों में बाँटें।
- प्रसाद और व्रत के नियम से बने सादे सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें।
ज्ञान केंद्र में और पढ़ें
- अबूझ मुहूर्त 2026 और 2027: क्या हैं, और क्या फिर भी मुहूर्त निकलवाएँ?
- विद्यारंभ संस्कार 2026: तिथि, सही उम्र और घर पर पूरी विधि
- भारत के फसल त्योहार: संक्रांति, पोंगल, बैसाखी और ओणम कब और क्यों
आने वाले व्रत और त्योहार
सभी त्योहार देखें- हल षष्ठी: 23 अगस्त 2027
- रांधण छठ: 23 अगस्त 2027
- शीतला सातम: 24 अगस्त 2027
- कृष्ण जन्माष्टमी: 25 अगस्त 2027
- गोगा नवमी: 26 अगस्त 2027
- बछ बारस: 28 अगस्त 2027