हल षष्ठी 2027

सोमवार, 23 अगस्त 2027

पूजा विधि


यह व्रत कौन करे?

  • माताएँ: मुख्य रूप से माताएँ यह व्रत अपने पुत्रों और संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं।
  • संतान की कामना करने वाली स्त्रियाँ: नवविवाहित या संतानहीन स्त्रियाँ भी संतान प्राप्ति के लिए षष्ठी देवी और भगवान बलराम का आशीर्वाद पाने हेतु यह व्रत करती हैं।
  • किसान परिवार: खेती से जीविका चलाने वाले परिवार भगवान बलराम के शस्त्र और औज़ार हल का पूजन करते हैं और अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं।

पूजा का समय

  • प्रातः की तैयारी: व्रत शुरू होने से पहले सुबह जल्दी, ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में या सूर्योदय के समय स्नान करके संकल्प लें।
  • पूजा मुहूर्त: वेदी तैयार हो जाने के बाद पूजा मध्याह्न (दोपहर) या अपराह्न में की जाती है। सही समय को लेकर परिवारों की परंपराएँ अलग-अलग हैं, इसलिए अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • व्रत खोलना: पूजा और कथा पूरी होने के बाद शाम को व्रत खोलें।

पर्व के बारे में

हल षष्ठी, जिसे बलराम जयंती भी कहते हैं, मध्य और उत्तर भारत का अत्यंत श्रद्धेय पर्व है, जिसमें माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखकर षष्ठी देवी और भगवान बलराम की पूजा करती हैं। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।


व्रत कथा (ग्वालिन और बेर के पेड़ की कथा)

एक समय की बात है, एक छोटे-से गाँव में एक ग्वालिन रहती थी, जिसका प्रसव का समय निकट था। उसके पास बेचने के लिए दूध के घड़े थे। कमाई घट जाने के डर से उसने गाय के दूध में भैंस का दूध मिला दिया और उसे शुद्ध गाय का दूध बताकर बेचने निकल पड़ी। रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा होने लगी और उसने एक बेर के पेड़ के नीचे पुत्र को जन्म दिया। नवजात को छाया में लिटाकर वह दूध बेचने जल्दी से गाँव चली गई।

पास ही एक किसान अपना खेत जोत रहा था। बैल हल को पेड़ के बहुत पास ले आए और हल की फाल अनजाने में बच्चे को लग गई। किसान शोक से काँप उठा। उसने बच्चे को बचाने का प्रयत्न किया और काँटों से उसका घाव सिल दिया, पर बच्चा बच न सका। ग्वालिन लौटी और अपने पुत्र को देखा, तो वह समझ गई कि उसके छल के कारण ही उस पर यह दुख आया है।

वह गाँव लौटी और सबके सामने स्वीकार किया कि उसने मिलावटी दूध को गाय का दूध बताकर बेचा था। उसने क्षमा माँगी। गाँव की स्त्रियों ने उसे ढाढ़स बँधाया और समझाया: "सच्चे मन से पश्चाताप करो और षष्ठी का व्रत रखो। शुद्ध हृदय से षष्ठी देवी और बलराम के हल की पूजा करो, और जिस अन्न को हल ने छुआ हो उसे मत खाओ। माता सत्य बोलने वालों पर दया करती हैं।"

ग्वालिन उस पेड़ के पास लौटी, तो देखकर चकित रह गई कि उसका पुत्र जीवित और स्वस्थ था। उसी दिन से माताएँ हल षष्ठी का व्रत रखती हैं और अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना करते हुए हल से उपजा अन्न नहीं खातीं।


पूजा सामग्री

दोपहर की पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • चित्र / वेदी की सामग्री: भगवान बलराम और षष्ठी देवी का चित्र, या मिट्टी अथवा गोबर की छोटी वेदी, जिस पर हल का चित्र बना हो
  • तिलक और पवित्र चूर्ण: रोली, कुमकुम और अक्षत
  • दीपक और प्रकाश: घी और रुई की बत्ती वाला मिट्टी का दीपक, और धूप
  • पवित्र जल का पात्र: ताज़े जल से भरा कलश या छोटा पात्र
  • भोग (नैवेद्य): भुने अनाज और दाने (भुना चना, मक्का), महुआ, पसही (जंगली) चावल, तथा भैंस का दूध, दही और घी (गाय के दूध से बनी कोई वस्तु नहीं)
  • पूजा की अन्य वस्तुएँ: फूल, कलावा, कुशा घास, और पलाश या बेर की एक छोटी टहनी

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातः की तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें।
  2. दाएँ हाथ की हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प (पवित्र प्रण) लें: "हे षष्ठी माता और भगवान बलराम, आज मैं अपनी संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और कल्याण के लिए यह व्रत रख रही हूँ। मुझे शुद्ध भक्ति के साथ यह व्रत पूरा करने की शक्ति दें।"
  3. दिन भर व्रत रखें। हल जोतकर उगाया हुआ कोई अनाज या सब्ज़ी न खाएँ; इसके बदले वे फल और खाद्य पदार्थ लें जो बिना हल चलाए उगते हैं, तथा भैंस के दूध से बनी चीज़ें लें।

चरण 2: पूजा की वेदी तैयार करना (दोपहर)

  1. पूजा का स्थान स्वच्छ करें, और फ़र्श या दीवार को गोबर या साफ़ कपड़े से लीपें।
  2. दीवार पर हल और षष्ठी देवी का चित्र बनाएँ, या लकड़ी की चौकी पर भगवान बलराम का चित्र रखें।
  3. आँगन में कई परिवार धरती में एक छोटा-सा तालाब (सगरी) बनाते हैं और उसके पास पलाश, बेर की टहनी और कुशा घास लगाते हैं।

चरण 3: पूजन विधि

  1. दीपक जलाना: भगवान बलराम और षष्ठी देवी के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  2. तिलक लगाना: चित्रों और कलश पर रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  3. फूल और कलावा चढ़ाना: ताज़े फूल चढ़ाएँ और कलश पर कलावे का एक टुकड़ा बाँधें।
  4. नैवेद्य अर्पित करना: भुना अनाज, पसही चावल और भैंस के दूध से बनी चीज़ें देवता के सामने रखें।

चरण 4: व्रत कथा का पाठ

  1. दाएँ हाथ में कुछ चावल के दाने और कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ लें।
  2. वेदी के सामने श्रद्धा से बैठें और पूरे ध्यान और भक्ति के साथ हल षष्ठी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  3. कथा पूरी होने पर दाने और पंखुड़ियाँ देवता के चरणों में अर्पित करें।

चरण 5: आरती और संतान के लिए प्रार्थना

  1. जलते हुए घी के दीपक से षष्ठी देवी और भगवान बलराम की आरती करें और भजन गाएँ।
  2. माताएँ परंपरा के अनुसार हल्दी के घोल में भिगोए कपड़े से हर बच्चे की पीठ को छूकर आशीर्वाद देती हैं, जिसे पोती कहते हैं (रीति हर परिवार में अलग हो सकती है)।
  3. अपनी संतान की दीर्घायु और सुख के लिए प्रार्थना करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और व्रत खोलना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. प्रसाद परिवार के सदस्यों और बच्चों में बाँटें।
  3. शाम को प्रसाद और हल से न उपजे अन्न से बने सादे सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें।

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