ज्येष्ठा गौरी आवाहन 2027
मंगलवार, 7 सितंबर 2027
पूजा विधि
यह पूजा कौन करे?
- विवाहित महिलाएँ: विवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य (अटल वैवाहिक सुख) और पति तथा परिवार की कुशलता की कामना से माता गौरी का घर में स्वागत करती हैं।
- घर के सभी सदस्य: पूरा परिवार इस स्वागत में सम्मिलित होता है और घर में शांति, समृद्धि तथा माता के आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है।
पूजा का समय
- प्रातःकालीन तैयारी: भोर में ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में स्नान करें और घर तथा पूजा स्थान की सफ़ाई करें।
- आवाहन (गौरी का स्वागत): अनुराधा नक्षत्र के दिन प्रातःकाल, मध्याह्न (दोपहर) में या उससे पहले किया जाता है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें। (समय परिवारों में अलग-अलग हो सकता है।)
- सायं आरती: सूर्यास्त के बाद शाम को माता की आरती की जाती है।
पर्व के बारे में
ज्येष्ठा गौरी आवाहन तीन दिन के ज्येष्ठा गौरी पर्व का पहला दिन है। यह महाराष्ट्र का एक प्रिय पर्व है, जिसमें गणेशोत्सव के दौरान माता गौरी का घर में स्वागत किया जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र के दिन मनाया जाता है।
कथा (ज्येष्ठा गौरी की कथा)
बहुत समय पहले एक भयंकर राक्षस ने धरती पर आतंक मचा रखा था। सबसे अधिक कष्ट महिलाओं को हुआ, क्योंकि उनके घर और परिवार असुरक्षित हो गए थे। दुखी होकर उन्होंने जगत्जननी माता गौरी से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की।
उनकी प्रार्थना से द्रवित होकर माता गौरी धरती पर उतरीं। उन्होंने राक्षस का संहार किया और शांति लौटा दी, और महिलाएँ भय से मुक्त हो गईं। वे माता का आभार मानना चाहती थीं और उन्हें अपने पास रखना चाहती थीं, पर उन्हें समझ नहीं आता था कि इतना कुछ देने वाली देवी का सम्मान कैसे करें।
माता ने उन्हें आशीर्वाद देकर कहा: "मैं हर वर्ष भाद्रपद मास में तुम्हारे घर आऊँगी। प्रेम से मेरा स्वागत करना, मेरा श्रृंगार करना और अपने हाथों से मुझे भोजन कराना। मैं तुम्हारे घरों को सौभाग्य और समृद्धि से भर दूँगी।"
महिलाओं ने आनंद से माता गौरी का अपने घर में स्वागत किया। माता उनके साथ ऐसे रहीं जैसे लाड़ली बेटी अपने मायके आती है। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें सौभाग्य और परिवार का सुख प्रदान किया। तभी से महाराष्ट्र में महिलाएँ हर वर्ष ज्येष्ठा गौरी का स्वागत करती हैं, मानो माता अपने मायके पधारी हों।
पूजा सामग्री
आवाहन शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:
- गौरी की प्रतिमाएँ: गौरी के मुखौटे (मुखवटे), या गौरी की मूर्ति, या पवित्र पत्थर (खड्यांच्या गौरी), जैसी आपके परिवार की परंपरा हो
- स्वागत की सामग्री: जल से भरा कलश या पात्र, साड़ी और ब्लाउज़ का कपड़ा, तथा माता के श्रृंगार के लिए पारंपरिक आभूषण
- तिलक और पूजन सामग्री: हल्दी, कुमकुम और अक्षत
- दीपक और ज्योति: घी और रुई की बाती वाला पीतल का दीपक, तथा जलती हुई समई
- फूल और पत्ते: ताज़े फूल, दूर्वा, तथा तुलसी और बेलपत्र जैसे पत्ते
- नैवेद्य: पेड़ा जैसी मिठाइयाँ, फल, तथा पान के पत्ते और सुपारी
पूजा विधि (चरण-दर-चरण)
विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:
चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (महिलाएँ परंपरा के अनुसार नौवारी या कोई अन्य साड़ी पहनें)।
- घर की सफ़ाई करें और प्रवेश द्वार को रंगोली और फूलों की मालाओं से सजाएँ।
- दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे माता गौरी, आज मैं भक्तिभाव से आपका अपने घर में स्वागत करती हूँ। मेरे परिवार को सुख, शांति और अटल सौभाग्य का आशीर्वाद दें।"
चरण 2: घर और चौकी की तैयारी
- घर के प्रवेश द्वार से लेकर उस स्थान तक, जहाँ माता को विराजमान करना है, रंगोली या कुमकुम से माता के छोटे-छोटे चरण बनाएँ।
- गणेश जी की मूर्ति के पास का स्थान साफ़ करें और स्वच्छ कपड़ा बिछाकर सजा हुआ आसन तैयार करें।
- जल से भरा कलश रखें और गौरी की प्रतिमाएँ या मुखौटे तैयार रखें।
चरण 3: आवाहन (गौरी का स्वागत)
- माता को लाना: घर की कोई विवाहित महिला गौरी के मुखौटे या पवित्र पत्थरों को पात्र में रखकर प्रवेश द्वार से धीरे-धीरे चरणों के चिह्नों पर चलते हुए ले आए।
- द्वार पर स्वागत: द्वार पर जल अर्पित करें, हल्दी-कुमकुम लगाएँ और अतिथि के रूप में माता से भीतर पधारने का निवेदन करें।
- गौरी को विराजमान करना: गौरी को तैयार आसन पर गणेश जी के पास विराजमान करें, उन्हें साड़ी, आभूषण और फूलों से सजाएँ, और हल्दी, कुमकुम तथा अक्षत लगाएँ।
- दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर माता के सामने रखें।
चरण 4: पूजन अर्पण
- माता को ताज़े फूल, दूर्वा, पत्ते तथा पान के पत्ते और सुपारी अर्पित करें।
- मिठाइयों और फलों का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- घर की महिलाओं के साथ गौरी के नामों का जाप करें और भक्ति गीत गाएँ।
चरण 5: सायं आरती
- शाम को दीपक फिर से जलाएँ और भक्ति गीत गाते हुए गौरी आरती करें।
- फूल और नैवेद्य की अंतिम बार भेंट चढ़ाएँ।
- माता के पास एक दीपक रखें, ताकि वह रात भर जलता रहे।
चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना
- परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
- नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बाँटें।
- परिवार के साथ सादा, सात्विक भोजन करें।
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