ज्येष्ठा गौरी पूजन 2027

बुधवार, 8 सितंबर 2027

पूजा विधि


यह पूजा कौन करे?

  • विवाहित महिलाएँ: विवाहित महिलाएँ मुख्य पूजा करती हैं और अखंड सौभाग्य (अटल वैवाहिक सुख) तथा पति और परिवार की कुशलता की प्रार्थना करती हैं।
  • घर के सभी सदस्य: पूरा परिवार पूजन में सम्मिलित होता है और समृद्धि तथा घर में माता के आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है।

पूजा का समय

  • प्रातःकालीन तैयारी: सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में स्नान करें और पूजा स्थान साफ़ करें।
  • मुख्य पूजा: ज्येष्ठा नक्षत्र के दिन प्रातःकाल, मध्याह्न (दोपहर) में या उससे पहले की जाती है। अपने शहर का पूजा मुहूर्त इसी पृष्ठ पर देखें।
  • हल्दी-कुमकुम का आयोजन: दोपहर या शाम को होता है, जब आस-पड़ोस की महिलाओं को घर बुलाया जाता है। (समय परिवारों में अलग-अलग हो सकता है।)

पर्व के बारे में

ज्येष्ठा गौरी पूजन तीन दिन के ज्येष्ठा गौरी पर्व का दूसरा और मुख्य दिन है। यह महाराष्ट्र का एक प्रिय पर्व है, जिसमें गणेशोत्सव के दौरान घर में माता गौरी की पूजा की जाती है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में ज्येष्ठा नक्षत्र के दिन मनाया जाता है।


कथा (ज्येष्ठा गौरी की कथा)

बहुत समय पहले एक भयंकर राक्षस ने धरती पर आतंक मचा रखा था। सबसे अधिक कष्ट महिलाओं को हुआ, क्योंकि उनके घर और परिवार असुरक्षित हो गए थे। दुखी होकर उन्होंने जगत्जननी माता गौरी से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की।

उनकी प्रार्थना से द्रवित होकर माता गौरी धरती पर उतरीं। उन्होंने राक्षस का संहार किया और शांति लौटा दी, और महिलाएँ भय से मुक्त हो गईं। वे माता का आभार मानना चाहती थीं, पर उन्हें समझ नहीं आता था कि इतना कुछ देने वाली देवी का सम्मान कैसे करें।

माता ने उन्हें आशीर्वाद देकर कहा: "मैं हर वर्ष भाद्रपद मास में तुम्हारे घर आऊँगी। प्रेम से मेरा स्वागत करना, मेरा श्रृंगार करना और अपने हाथों से मुझे भोजन कराना। मैं तुम्हारे घरों को सौभाग्य और समृद्धि से भर दूँगी।"

महिलाओं ने भोजन, फूलों और गीतों से माता की पूजा की, और माता उनके साथ ऐसे रहीं जैसे लाड़ली बेटी अपने मायके आई हो। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें सौभाग्य और परिवार का सुख प्रदान किया। तभी से महाराष्ट्र में महिलाएँ हर वर्ष भोजन का भव्य भोग लगाकर ज्येष्ठा गौरी की पूजा करती हैं।


पूजा सामग्री

मुख्य पूजा शुरू करने से पहले ये सामग्री एकत्र कर लें:

  • गौरी की प्रतिमाएँ: घर में पहले से विराजमान गौरी के मुखौटे (मुखवटे), मूर्ति या पवित्र पत्थर
  • श्रृंगार सामग्री: माता के लिए साड़ी और ब्लाउज़ का कपड़ा, आभूषण और फूलों की माला
  • तिलक और पूजन सामग्री: हल्दी, कुमकुम और अक्षत
  • दीपक और ज्योति: घी और रुई की बाती वाला पीतल का दीपक, तथा अगरबत्ती
  • फूल और पत्ते: ताज़े फूल, दूर्वा, तथा तुलसी और बेलपत्र जैसे पत्ते
  • नैवेद्य: पूरन पोली, भाखरी, मौसमी सब्ज़ियों की मिली-जुली सब्ज़ी, कढ़ी, खीर और अन्य त्योहारी पकवान

पूजा विधि (चरण-दर-चरण)

विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के लिए इन चरणों का ध्यान से पालन करें:

चरण 1: प्रातःकालीन तैयारी और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, शुभ वस्त्र पहनें (महिलाएँ परंपरा के अनुसार साड़ी पहनें)।
  2. माता के आस-पास का स्थान साफ़ करें और ताज़े फूलों तथा रंगोली से सजावट नई कर दें।
  3. दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें: "हे माता गौरी, आज मैं भक्तिभाव से आपकी पूजा करती हूँ। मेरे परिवार को सुख, समृद्धि और अटल सौभाग्य का आशीर्वाद दें।"

चरण 2: नैवेद्य तैयार करना

  1. सुबह त्योहारी भोजन बनाएँ, जिसमें मीठे और नमकीन पकवान हों तथा कई मौसमी सब्ज़ियों की मिली-जुली सब्ज़ी भी हो (जैसी आपके परिवार की परंपरा हो)।
  2. माता के लिए हर पकवान का एक हिस्सा पत्तल या थाली में सजाएँ।
  3. पूजा शुरू होने तक भोग को साफ़ और ढककर रखें।

चरण 3: पूजा करना

  1. दीपक जलाना: घी का दीपक जलाकर गौरी के सामने रखें।
  2. माता का श्रृंगार: उन्हें नई साड़ी और आभूषण पहनाएँ तथा फूल अर्पित करें।
  3. तिलक लगाना: माता को हल्दी, कुमकुम और अक्षत लगाएँ।
  4. पत्ते अर्पित करना: दूर्वा, तुलसी और बेलपत्र चढ़ाएँ।

चरण 4: नैवेद्य अर्पण और कथा पाठ

  1. तैयार पकवान माता को नैवेद्य के रूप में अर्पित करें।
  2. चौकी के सामने श्रद्धा से बैठकर ज्येष्ठा गौरी की कथा पढ़ें या सुनें।
  3. घर की महिलाओं के साथ माता की स्तुति में भक्ति गीत गाएँ।

चरण 5: आरती और हल्दी-कुमकुम

  1. जलते हुए घी के दीपक से भक्ति गीत गाते हुए गौरी आरती करें।
  2. आस-पड़ोस की विवाहित महिलाओं को बुलाएँ और उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाएँ।
  3. हर महिला को पान का पत्ता, नारियल या ब्लाउज़ का कपड़ा जैसा छोटा उपहार मिठाई (वायन) के साथ भेंट करें।

चरण 6: आशीर्वाद लेना और प्रसाद बाँटना

  1. परिवार के बड़ों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें (चरण स्पर्श)।
  2. नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और अतिथियों में बाँटें।
  3. परिवार के साथ त्योहारी भोजन करें।

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